एक स्त्री अपने जीवन में दो पुरूषों को सबसे ज्यादा समझ सकती है...!
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प्रेमी और पुत्र प्रेम के प्रेम में स्त्री सदा हारकर ही खुद की जीत स्थापित करती है, परन्तु ये दोनों ही पुरूष सबसे ज्यादा इस बात से अनभिज्ञ होते हैं या उनमें इस प्रेम को समझने का बोध नहीं होता।
यह एक रिश्ता ऐसा होता है जिसकी हर बात को हम मन से ही नहीं शरीर से शिराओं से, अपनी त्वचा तक में महसूस कर पाते हैं। इसके लिए स्पर्श ही, भाषा का नहीं भाषा भी स्पर्श का कार्य करती है। मन से मस्तिष्क तक की सभी इन्द्रियां प्रेम की अनुभूतियों में संचित होती है....जब तक कोई औरत मां नहीं बन जाती वो अपने आपको पूर्ण औरत नही समझती हैं। अतः एक औरत की पूर्णता उसके मां बनने से जुड़ी हुई है।एक औरत के लिए मां बनना एक दैवीय अनुभव होता हैं।जितनी खुशी उसको मां बनने से प्राप्त होती है उससे ज्यादा खुशी उसको किसी अन्य रिश्ते ,नाते, या सम्पूर्ण भौतिक सुविधाओं की प्राप्ति के बाद भी नही होती है।
जहां तक पति और संतान के बीच एक औरत के लिए किसी एक को चुनने के स्थिति आ जाये तो पति पर संतान को ही प्राथमिकता देगी।औरत के लिए संतान उसका अपना सृजन है।और संतान रूप में अपना सृजन उसको इस दुनिया मैं सबसे प्रिय होता हैं।पति उसके लिए गृहस्थ धर्म की जिम्मेदारी है ।सामाजिक संस्कार है।जो उसको निभाना है। पति उसका प्रेम है,प्यार है,सुरक्षा है,उसका सब कुछ है।लेकिन संतान उसके लिए सृजन है।औरत एक नई जिंदगी की वाहक की होती है।असंख्य कष्ट सहन कर संतान को जन्म देती है।इसलिये नैसर्गिक रूप से एक औरत पति के वनिस्पत संतान के ज्यादा निकट होती है।ओर सन्तान ही उसको पति से ज्यादा प्रिय होती है।
प्रेमी और पुत्र मोह के इस प्रेम में
स्त्री सदा हारकर ही
खुद की जीत स्थापित करती है
स्वयं को स्वयं के अनुबंध से मुक्त करती है...!!
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