क्यों धुँधला जाती है रिश्तों की यह गर्माहट ? कृष्ण-दृष्टि से देखें जीवन के रिश्ते भारतीय जीवन में रिश्तों की गर्माहट बहुत जल्दी जन्म लेती है। अपनापन, उत्साह, सम्मान और आत्मीयता—सब कुछ आरम्भ में जैसे एक साथ खिल उठता है। चाहे वह दाम्पत्य हो, परिवार के नए संबंध हों, मित्रता हो या कार्यस्थल के रिश्ते—शुरुआत अक्सर पूरी ऊर्जा और भावनात्मक उजास से भरी होती है। पर उतनी ही सहजता से, कभी-कभी यह ऊष्मा धुँधली भी पड़ने लगती है। जो संबंध कभी उत्सव थे, वे धीरे-धीरे औपचारिकता बन जाते हैं। कभी-कभी यह ठंडापन खीझ, कटुता और अनकही शिकायतों का रूप ले लेता है। प्रश्न स्वाभाविक है— ऐसा क्यों होता है? क्या रिश्तों का यह क्षरण अनिवार्य है? और क्या इससे बाहर निकलने का कोई मार्ग है? यदि हम जीवन के रिश्तों को कृष्ण के जीवन-दर्शन की कसौटी पर परखें, तो यह स्पष्ट होता है कि यह धुँधलापन न किसी एक व्यक्ति की विफलता है, न कोई दुर्भाग्य। यह संबंधों के स्वभाव की एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। इसे समझ लेने पर रिश्तों का बहुत-सा मानसिक बोझ अपने-आप हल्का हो जाता है। पहला बिन्दु — आरम्भिक सम्मान का “अतिप्रकाश” ...