कुछ गीत, कुछ यादें और चंद मिसरों में सिमटा एक अधूरा अफ़साना
कभी-कभी लगता है, पूरी ज़िंदगी किसी लंबे उपन्यास की तरह नहीं, बल्कि कुछ गीतों, कुछ ग़ज़लों और अधूरे मिसरों में लिखी गई है। कुछ धुनें ऐसी होती हैं जो वक़्त बीत जाने के बाद भी भीतर कहीं बजती रहती हैं। बरसों बाद अचानक कोई गीत सुनाई देता है और लगता है—अरे, यह तो मेरी ही कहानी थी!
याद आता है वह युवा उम्र का समय, जब कॉलेज के दिनों में हम गुनगुनाया करते थे—
“तुमको देखा तो ये ख़याल आया,
ज़िंदगी धूप तुम घना साया…”
तब शायद नैपथ्य में कहीं यह दुआ भी बजती रहती थी—
“ऐ ख़ुदा! रेत के सहरा को समन्दर कर दे,
या छलकती हुई आँखों को भी पत्थर कर दे…”
पता नहीं किसने “आमीन” कहा था कि वह दुआ क़ुबूल हो गई। उसके बाद ज़िंदगी ने ऐसी करवट ली कि सामने बस यही एहसास रह गया—
“पत्थर के ख़ुदा, पत्थर के सनम, पत्थर के इंसाँ पाए हैं,
तुम शहर-ए-मोहब्बत कहते हो, हम जान बचाकर आए हैं…”
फिर कुछ यूँ हुआ कि—
“चमकते चाँद को टूटा हुआ तारा बना डाला,
मेरी बरबादियों ने मुझको बंजारा बना डाला…”
और उस यायावरी के आलम में—
“अजनबी शहर के अजनबी रास्ते मेरी तन्हाई पर मुस्कुराते रहे,
मैं बहुत देर तक यूँ ही चलता रहा, तुम बहुत दूर तक याद आते रहे…”
शायद ज़िंदगी का सबसे मुश्किल सफ़र वही होता है, जिसमें रास्ते तो बहुत होते हैं, मगर मंज़िल किसी एक को चुनना चाहती है।
एक दिन उसी दोराहे पर खड़े होकर मैंने ग़म-ए-ज़िंदगी से पूछा—
“कुछ तो दे मशवरा…
एक तरफ़ उसका घर, एक तरफ़ मयकदा…
मैं कहाँ जाऊँ? कुछ तो दे मशवरा…”
मगर ज़िंदगी की राहों ने कोई साफ़ जवाब नहीं दिया। बस इतना कहा—
“ज़िंदगी की राहों में रंज-ओ-ग़म के मेले थे,
भीड़ थी क़यामत की और हम अकेले थे…”
तब जाकर समझ आया—
“दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है,
मिल जाए तो मिट्टी है, खो जाए तो सोना है…”
और कभी-कभी यह सवाल भी भीतर उठता रहा—
“क्यों ज़िंदगी की राह में मजबूर हो गए,
इतना हुए क़रीब कि हम दूर हो गए…”
तुम्हारे कुछ अल्फ़ाज़ जाने कितने बरस कानों में गूँजते रहे—
“तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो,
क्या ग़म है जिसको छुपा रहे हो…”
जी में आया कि कह दूँ—
“शायद मैं ज़िंदगी की सहर ले के आ गया,
क़ातिल को आज अपने ही घर ले के आ गया…”
मगर तभी दिल के किसी कोने में एक हल्की-सी हलचल हुई—
“दिल में एक लहर-सी उठी कहीं,
कोई ताज़ा हवा चली कहीं…”
और दिल फिर फ़रियाद कर उठा—
“हम तेरे शहर में आए हैं मुसाफ़िर की तरह,
सिर्फ़ एक बार मुलाक़ात का मौक़ा दे दे…”
मन को उम्मीद थी कि शायद तुम कहोगे—
“तुम अपना रंज-ओ-ग़म, अपनी परेशानी मुझे दे दो…”
लेकिन जवाब कुछ और था—
“तू मेरे साथ न चल,
लोग इल्ज़ाम लगा देंगे, ज़माने से सँभल…”
फिर वही पुरानी बेचैनी लौट आई—
“हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले,
बहुत निकले मेरे अरमान, लेकिन फिर भी कम निकले…”
कभी तुम ख़्वाब में आए तो लगा—
“कल चौदहवीं की रात थी, शब भर रहा चर्चा तेरा,
कुछ ने कहा ये चाँद है, कुछ ने कहा चेहरा तेरा…”
उसी बेख़ुदी में कदम मयख़ाने की तरफ़ बढ़ चले। दिल बग़ावत पर आमादा था। वह कह रहा था—
“ना-तजुर्बेकारी से वाइज़ की ये बातें हैं,
उस रंग को क्या जाने, पूछो जो कभी पी है…”
और फिर ग़ालिब याद आए—
“कहाँ मयख़ाने का दरवाज़ा, ‘ग़ालिब’, और कहाँ वाइज़,
पर इतना जानते हैं, कल वो जाता था कि हम निकले…”
मगर उस बेख़ुदी में भी एक ख़त सामने था—तुम्हारी ख़ुशबू में बसा हुआ।
सोचा—
“तेरी ख़ुशबू में बसे ख़त को जलाता कैसे…”
फिर डर लगा कि अगर बात निकली तो दूर तलक जाएगी—
“बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी,
लोग बेवजह उदासी का सबब पूछेंगे…”
सो, मैं लौट आया।
इस ख़याल के साथ कि शायद कुछ रिश्तों का सबसे ख़ूबसूरत मुक़ाम उनका अधूरा रह जाना ही होता है। हर कहानी को अंजाम तक पहुँचना ज़रूरी नहीं। कुछ कहानियाँ रास्ते में ही अपना अर्थ पा लेती हैं—किसी गीत की एक पंक्ति में, किसी पुराने ख़त की ख़ुशबू में, किसी ख़ामोश मुलाक़ात में या फिर किसी ऐसे नाम में, जिसे पुकारना अब मुमकिन नहीं।
और शायद इसीलिए हम अपने सफ़र के भी पूरी तरह मालिक नहीं होते—
“अपनी मर्ज़ी से कहाँ, अपने सफ़र के हम हैं,
रुख़ हवाओं का जिधर का है, उधर के हम हैं…”
शायद कुछ कहानियाँ पूरी होने के लिए होती ही नहीं हैं।
वे बस कुछ गीतों, कुछ ग़ज़लों, कुछ अधूरी मुलाक़ातों और कुछ अनकही बातों में सिमट जाती हैं।
फिर वक़्त गुजरता है। ज़िंदगी अपनी रफ़्तार से चलती रहती है। चेहरे बदल जाते हैं, शहर बदल जाते हैं, आवाज़ें ख़ामोश हो जाती हैं—लेकिन कोई पुरानी धुन अचानक कानों में पड़ती है और बरसों पुराना मौसम लौट आता है।
तब लगता है, कहानी ख़त्म कहाँ हुई थी?
वह तो अब भी वहीं है—किसी गीत की अगली पंक्ति में, किसी अधूरे ख़त के आख़िरी शब्द में, किसी ख़ामोश शाम की तन्हाई में।
और फिर एक दिन मन ने आख़िरी बार कहा—
“चलो, एक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों…”
शायद यही उस अधूरे अफ़साने का सबसे मुकम्मल अंत था।💖
