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  क्यों धुँधला जाती है रिश्तों की यह गर्माहट ? कृष्ण-दृष्टि से देखें जीवन के रिश्ते भारतीय जीवन में रिश्तों की गर्माहट बहुत जल्दी जन्म लेती है। अपनापन, उत्साह, सम्मान और आत्मीयता—सब कुछ आरम्भ में जैसे एक साथ खिल उठता है। चाहे वह दाम्पत्य हो, परिवार के नए संबंध हों, मित्रता हो या कार्यस्थल के रिश्ते—शुरुआत अक्सर पूरी ऊर्जा और भावनात्मक उजास से भरी होती है। पर उतनी ही सहजता से, कभी-कभी यह ऊष्मा धुँधली भी पड़ने लगती है। जो संबंध कभी उत्सव थे, वे धीरे-धीरे औपचारिकता बन जाते हैं। कभी-कभी यह ठंडापन खीझ, कटुता और अनकही शिकायतों का रूप ले लेता है। प्रश्न स्वाभाविक है— ऐसा क्यों होता है? क्या रिश्तों का यह क्षरण अनिवार्य है? और क्या इससे बाहर निकलने का कोई मार्ग है? यदि हम जीवन के रिश्तों को कृष्ण के जीवन-दर्शन की कसौटी पर परखें, तो यह स्पष्ट होता है कि यह धुँधलापन न किसी एक व्यक्ति की विफलता है, न कोई दुर्भाग्य। यह संबंधों के स्वभाव की एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। इसे समझ लेने पर रिश्तों का बहुत-सा मानसिक बोझ अपने-आप हल्का हो जाता है। पहला बिन्दु — आरम्भिक सम्मान का “अतिप्रकाश” ...
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  सुहानी रात ढल चुकी ,न जाने तुम कब आओगे ..... दाशर्निक अर्थ!          ============================== ============== संसार बहुत विचित्र है और उतनी ही विचित्र है कवि, रचनाकारों की कल्पना ! विश्व के कण कण में एक संदेश है। सिर्फ उसे खोजने वाली बुद्धि चाहिये! कोई लेखक, कवि, रचनाकार कुछ भी लिख देता है तो उसका अर्थ पढ़ने सुनने वाले की योग्यता और मानसिक क्षमता पर निर्भर करता है। ऐसा ही एक गीत गीतकार शकील बदायुनी साहब ने लिखा।  आइये समझते हैं गीत सुहानी रात ढल चुकी का दार्शनिक अर्थ ...... रात्रि में मनुष्य नींद में रहता है, यह गफलत और बेहोशी की स्थिति होती है, उस समय प्राणी वास्तविकता से दूर होकर स्वप्नलोक में विचरण करता है। इसी प्रकार यह जीवन भी मोह निशा में फँसा है। मोह माया के परदे ने सबको अन्धकार में रखा हुआ है इसी अन्धकार से आत्मा प्रकाश में जाना चाहती है -  " तमसो मा ज्योर्तिगमय, " यह जीवन (सुखमय) सुहाना प्रतीत होता है और मनुष्य जीवन भर (रात भर) सुखद कल्पनाओं के स्वप्न देखता है और जैसे ही स्वप्न खत्म हुआ ? कहीं कुछ भी नही रहता है। जीवन भर दौड़-धूप आपा...
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  आस्तिकता, नास्तिकता और शांति की खोज “जहाँ तर्क थक जाता है, वहीं से श्रद्धा की यात्रा शुरू होती है।” एक समय था जब मैं स्वयं को लगभग नास्तिक मान बैठा था। तर्क, प्रश्न और जीवन की कठिन परिस्थितियाँ—सब कुछ जैसे ईश्वर से दूरी बना रहा था। तब लगता था कि जो दिखाई दे, वही सत्य है; जो सिद्ध न हो, उस पर विश्वास क्यों किया जाए? पर समय के साथ अनुभव ने सिखाया कि जीवन केवल तर्क से नहीं चलता। आज जीवन प्रभु के भरोसे चल रहा है और इस स्वीकार के साथ मन में एक गहरी शांति उतर आई है। मैं यह बहस छेड़ना नहीं चाहता कि आस्तिक होना सही है या नास्तिक। यह लेख किसी निष्कर्ष को थोपने का प्रयास भी नहीं है। यह केवल एक अनुभव है—कि भक्ति मार्ग अपनाने से मन को एक आधार मिलता है। जीवन के उतार-चढ़ाव में जब सब कुछ डगमगाने लगता है, तब यह भरोसा संबल बन जाता है। “दुख में ईश्वर को याद करना मजबूरी नहीं, मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है।” नास्तिक होना वास्तव में आसान नहीं है। जीवन के झंझावात जब आते हैं, तो सबसे दृढ़ तर्क भी कमजोर पड़ने लगते हैं। ज़रा-सी असहायता में ईश्वर का आभास होने लगता है। जिनके पीछे परिवार है, जिम्मेदारिया...
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  दिल ढूंढ़ता है फिर वही… फ़ुरसत के कुछ पल दिल ढूंढ़ता है फिर वही… फ़ुरसत के चार दिन। पर प्रश्न यही है—वे चार दिन कौन से हैं? कब मिलते हैं, और कब तक हमारे रहते हैं? शायद यही वे पल हैं, जिनकी तलाश में मनुष्य पूरी उम्र भटकता रहता है। जब बहादुर शाह ज़फ़र अपने महल को आख़िरी बार निहार रहे थे—तख़्त जा चुका था, साम्राज्य बिखर चुका था—तब उनकी ज़ुबान से निकला यह दर्द आज भी समय की छाती पर दर्ज है— “उम्र-ए-दराज़ मांग के लाई थी चार दिन, दो आरज़ू में कट गये, दो इंतज़ार में।” ज़िंदगी पर बातें होती रही हैं और होती रहेंगी। ज़िंदगी चलती रही है और चलती रहेगी। हम भी शायद यूँ ही ज़िंदगी का साथ निभाते रहेंगे, जब तक ज़िंदगी हमें अपने साथ लेकर चलती है—बिना शर्त, बिना किसी हिसाब-किताब के। किसी शायर ने कहा था— “उन्हें नफ़रत हुई सारे जहाँ से, नई दुनिया कोई लाए कहाँ से।” और उसी धरातल पर फ़िराक़ गोरखपुरी की पंक्तियाँ उम्मीद जगाती हैं— “ये माना ज़िंदगी है चार दिन की, बहुत होते हैं यारों चार दिन भी।” एक ओर उम्मीद से भरा शायर है, दूसरी ओर इतिहास में विलीन होता एक हारा हुआ बादशाह। ज़िंदगी इन्हीं दो...
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पहला–पहला प्यार… पहली–पहली धड़कनें मासूमियत से भरी एक स्मृति छठी कक्षा की बात है—क्लास में वह नई-नई आई थी। लगभग पच्चीस बच्चों में बस छह लड़कियाँ। अस्सी का दशक… सरकारी स्कूल…जहाँ “बेटी पढ़ाओ” का नारा तब तक किसी के कानों तक पहुँचा ही नहीं था। ज़्यादातर माता-पिता की चिंता बस इतनी थी— “लड़की को जल्दी ब्याह देना है।” लेकिन जैसे ही वह आई, हमारी क्लास का माहौल पल में बदल गया। देहाती सरकारी स्कूल के बच्चे अचानक “जी सर”, “यस मिस” बोलने लगे। काग़ज़ के गोले, चौक के बम—सब गायब। मानो एक लड़की के आने भर से क्लास टीचर का वर्षों पुराना अनुशासन सपना सच हो गया। उसका नाम था -- प्रीति।  और सच कहूँ तो उसके प्रीत में पूरा क्लास डूब चुका था। 10–11 साल की वह नाजुक उम्र— फड़कते बाजू, बढ़ती लंबाई, बदलती आवाज़…हर लड़का खुद को अमिताभ समझने लगा था और उसे—जया या नीतू। दो कसी हुई चोटियाँ, करीने की यूनिफॉर्म, आँखों में हल्का-सा काजल, गालों पर डिंपल और चाल में एक भोली-सी खनक—अगर क़यामत नहीं, तो कम भी नहीं। लड़कियाँ उससे थोड़ी-सी जलतीं, लड़के उससे पूरी तरह जल उठते— प्यार की आग में!  फिलहाल, ‘प्रीति’ का जलव...
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कहीं दूर जब दिन ढल जाए साँझ की दुल्हन बदन चुराए चुपके से आए मेरे ख़यालों के आँगन में कोई सपनों के दीप जलाए, दीप जलाए कहीं दूर........ ******************************** ये पंक्तियाँ सुनने से ही हमारे मन में प्यारी सी शाम की एक आकृति बन जाती है। जिसने जिस-जिस तरीके से इस संध्या बेला को अनुभव किया होता है वो उसी प्रकार से सुहानी शाम को मन में चित्रित करता है। हमारी तो हर मौसम की अलग-अलग तरह की शाम हुआ करती थी। गर्मियों के दिनों में धूप के ओझल होते ही दुआर (घर के बहार का हिस्सा) को बुहार कर साफ करके पानी छिड़क दिया जाता था। चारपाई बाहर निकालकर बिछा दी जाती थी। तपती धरती को जब ठंडा पानी की बुँदे छुती तो ऐसी मन मोहने वाली सुगंध उठती कि उसका मुकाबला महंगे से महंगा इत्र भी न कर सके।  घर की बहू-बेटियां दीया जलाकर अचरा से लक्ष्मी स्वरूपा दीया का माथा टेक कर मुख्य द्वार के चौखट पर रख देती थी। घर के छोटे बच्चे की जिम्मेदारी होती थी कि लालटेन के शीशे को साफ करके चमका कर उसे जला कर बरामदे में टंगी कीली पर टांग दे। अपना चारा खाकर पेट भर चुके पालतू पशु शाम होते ही मालिक का बाट जोहने लगते थे कि मालि...

श्रद्धांजलि मेरे जीवन के सबसे बड़े मार्गदर्शक को

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  #संस्मरण_पुण्य_स्मरण🪴 श्रद्धांजलि मेरे जीवन के सबसे बड़े मार्गदर्शक को🙏 कुछ रिश्ते खून के नहीं होते, लेकिन उनका स्थान जीवन में किसी अपने से भी बढ़कर हो जाता है। मेरे फूफा जी (स्वर्गीय श्री जयनारायण सिंह) मेरे लिए वही थे। जब मैं बहुत छोटा था और बाबूजी का साया सिर से उठ गया, तब ज़िंदगी जैसे थम सी गई थी। लेकिन तभी उन्होंने न सिर्फ मुझे सहारा दिया, बल्कि मुझे अपना बेटा मानकर पाला-पोसा। मैंने उनका घर नहीं, अपना घर पाया — और उनके स्नेह, अनुशासन और संरक्षण में पूरे १० -१२   साल बिताए। वो सख्त ज़रूर थे, लेकिन उनका दिल बेहद कोमल था। उनके हर डांट के पीछे मेरा भविष्य संवारने की चिंता छिपी होती थी। उन्होंने हमेशा मुझे सही राह दिखाने की कोशिश की — चाहे पढ़ाई हो, जीवन के मूल्य हों, या लोगों से व्यवहार। वे खुद बहुत साधारण जीवन जीते थे, लेकिन उनके विचार और संस्कार असाधारण थे। गाँव  पंचायत  में हर कोई उनका सम्मान करता था, क्योंकि वे सच्चाई, ईमानदारी और न्याय के प्रतीक थे। वो कहा करते थे — “जीवन में कुछ भी बनो, लेकिन अच्छा इंसान जरूर बनना।” आज जब मैं अपने जीवन में कुछ भी...