पहला–पहला प्यार… पहली–पहली धड़कनें

मासूमियत से भरी एक स्मृति

छठी कक्षा की बात है—क्लास में वह नई-नई आई थी। लगभग पच्चीस बच्चों में बस छह लड़कियाँ। अस्सी का दशक… सरकारी स्कूल…जहाँ “बेटी पढ़ाओ” का नारा तब तक किसी के कानों तक पहुँचा ही नहीं था। ज़्यादातर माता-पिता की चिंता बस इतनी थी—“लड़की को जल्दी ब्याह देना है।”

लेकिन जैसे ही वह आई, हमारी क्लास का माहौल पल में बदल गया। देहाती सरकारी स्कूल के बच्चे अचानक “जी सर”, “यस मिस” बोलने लगे। काग़ज़ के गोले, चौक के बम—सब गायब।
मानो एक लड़की के आने भर से क्लास टीचर का वर्षों पुराना अनुशासन सपना सच हो गया। उसका नाम था --प्रीति। और सच कहूँ तो उसके प्रीत में पूरा क्लास डूब चुका था। 10–11 साल की वह नाजुक उम्र—

फड़कते बाजू, बढ़ती लंबाई, बदलती आवाज़…हर लड़का खुद को अमिताभ समझने लगा था और उसे—जया या नीतू। दो कसी हुई चोटियाँ, करीने की यूनिफॉर्म, आँखों में हल्का-सा काजल, गालों पर डिंपल और चाल में एक भोली-सी खनक—अगर क़यामत नहीं, तो कम भी नहीं।

लड़कियाँ उससे थोड़ी-सी जलतीं, लड़के उससे पूरी तरह जल उठते—प्यार की आग में! फिलहाल, ‘प्रीति’ का जलवा सिर चढ़कर बोल रहा था…और हम कैसे अछूते रहते?


शाम को खेलते-खेलते मेरे परम मित्र ‘गिरजेश’ (काल्पनिक नाम) ने कहा—“मित्र, कल बढ़िया कपड़ा पहनकर स्कूल आना है।”

बस, उसी दिन से डबल आयरन की हुई कमीज़, जमे हुए बाल, समय से पहले स्कूल पहुँचना—सब हमारी दिनचर्या बन गया। पिछली बेंच से धीरे-धीरे पहली बेंच तक की यात्रा शुरू हुई।

तीन दिनों में प्रगति शानदार—दो बार पानी की लाइन में उसने जगह दी, एक बार गिरी हुई कॉपी उठाकर “थैंक्यू” कहा। धड़कनें तेज़, कदम हल्के, सपने बड़े। पहला प्यार… होने नहीं दिया गया—करवा दिया गया!

होली आने वाली थी। सरकारी स्कूल में पिचकारी कहाँ…सो हम लोग फाउंटेन पेन की स्याही से ही एक-दूसरे को रंग देते। दोस्तों के उकसावे पर मैंने भी हिम्मत करके धीरे से उसके हाथ की पीठ पर नीली स्याही की एक हल्की रेखा खींच दी। वह चौंकी नहीं—बस मुस्कुरा दी। और बोली—“बस इतनी ही होली?”

उस मुस्कान ने मेरे भीतर रंगों की पूरी पिचकारी भर दी।

मैं अंदर से बहुत शर्मीला था। मंच, संगीत, भीड़—सबसे डरता था। पर एक दिन मित्र ने बताया“प्रीति बहुत अच्छा फिल्मी गीत गाती है!”

बस, यह सुनना था कि मेरी हिम्मत में भी एक छोटा-सा फूल खिल उठा। उस दिन मैं कार्यक्रम में भाग लेने तो क्या… चुपचाप पीछे दरवाज़े के पास खड़ा बस प्रीति को गाते सुनने आया था। अचानक मेरे मित्र ने भीड़ में खड़े होकर जोर-जोर से मेरा नाम पुकार दिया—“आमोद कहाँ है? आमोद… आमोद!”

मजबूरी में सामने आना पड़ा। दिल काँप रहा था। और फिर पहली बार गाया—“कोयल बोली, दुनिया डोली… समझो दिल की बोली…” (इससे पहले प्रीति ‘दुनिया में आए हैं तो जीना ही पड़ेगा’ गाकर गई थी।)

उस पल न भीड़ दिखी, न सभागार— बस एक ही सवाल—क्या प्रीति सुन रही होगी?

कार्यक्रम खत्म हुआ। टीचर ने कहा— “पहले लड़कियाँ बाहर निकलें।” प्रीति धीरे-धीरे चल रही थी। जैसे कुछ कहना चाहती हो। सीढ़ियों से उतरते हुए वह मेरे पास आई और धीमे से बोली— “तुम यह गीत मुझे लिखकर दोगे…?”

बस… उसी क्षण लगा पहला प्यार मन ही मन कुलांचे भर रहा था। उसके डिंपल जैसे और गहरे, आवाज़ जैसे और मीठी, और संसार जैसे अचानक बहुत सुंदर हो गया।

मैंने गीत लिखकर दे दिया। वह उसे छुपा-छुपा कर गुनगुनाती, और क्लास में हमारी नज़रें मिलते ही हल्की-सी मुस्कान बिखेर देती। लेकिन… हमारे मित्र ‘सुरेश’ (काल्पनिक नाम) को भनक लग गई। एक दिन उसने प्रीति के हाथ से वह कागज़ छीन लिया— और अगले दिन पूरे क्लास में फैला दिया। प्रीति रो पड़ी।टीचर आए और मुझे व मेरे एक और मित्र ‘रविंद’ को काफ़ी डाँटा और मारा भी। उसके कुछ ही दिनों बाद प्रीति के पिता का शहर में तबादला हो गया। और वह चली गई—हमारी दुनिया से भी।

हम सब मैट्रिक पास कर शहर में पढ़ने गए। पढ़ाई के साथ-साथ मन में बस एक ही लालसा— कहीं एक बार प्रीति दिख जाए। लेकिन यक़ीन मानिए— उस दिन के बाद प्रीति कभी नहीं मिली।

पहला प्यार… बस एक मीठी स्मृति बनकर दिल के किसी कोने में हमेशा के लिए थम गया..💖📚🏫

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