दिल ढूंढ़ता है फिर वही… फ़ुरसत के कुछ पल
दिल ढूंढ़ता है फिर वही…
फ़ुरसत के चार दिन।
पर प्रश्न यही है—वे चार दिन कौन से हैं?
कब मिलते हैं, और कब तक हमारे रहते हैं?
शायद यही वे पल हैं, जिनकी तलाश में मनुष्य पूरी उम्र भटकता रहता है। जब बहादुर शाह ज़फ़र अपने महल को आख़िरी बार निहार रहे थे—तख़्त जा चुका था, साम्राज्य बिखर चुका था—तब उनकी ज़ुबान से निकला यह दर्द आज भी समय की छाती पर दर्ज है—
“उम्र-ए-दराज़ मांग के लाई थी चार दिन,
दो आरज़ू में कट गये, दो इंतज़ार में।”
ज़िंदगी पर बातें होती रही हैं और होती रहेंगी। ज़िंदगी चलती रही है और चलती रहेगी। हम भी शायद यूँ ही ज़िंदगी का साथ निभाते रहेंगे, जब तक ज़िंदगी हमें अपने साथ लेकर चलती है—बिना शर्त, बिना किसी हिसाब-किताब के।
किसी शायर ने कहा था—
“उन्हें नफ़रत हुई सारे जहाँ से,
नई दुनिया कोई लाए कहाँ से।”
और उसी धरातल पर फ़िराक़ गोरखपुरी की पंक्तियाँ उम्मीद जगाती हैं—
“ये माना ज़िंदगी है चार दिन की,
बहुत होते हैं यारों चार दिन भी।”
एक ओर उम्मीद से भरा शायर है, दूसरी ओर इतिहास में विलीन होता एक हारा हुआ बादशाह। ज़िंदगी इन्हीं दो सिरों के बीच झूलती रहती है।
आज मैं अपने पुश्तैनी घर, अपने लोगों से मिलने जा रहा हूँ। बहुत समय बीत गया वहाँ गए हुए। न जाने कैसा होगा अब वह घर, वह मुहल्ला, वह गाँव। मन में अपार ख़ुशी है, तो कहीं भीतर एक हल्का-सा भय भी।
परिवर्तन जीवन का शाश्वत सत्य है—होना भी चाहिए। लेकिन छोटे शहरों का सुकून बड़े शहरों में परछाईं की तरह हमारे साथ चलता है। वह धीरे-धीरे आँखों पर हाथ रखकर झाँकता है कि कहीं उन्नति की चकाचौंध में हमारी दृष्टि कुंद न हो जाए।
घर की याद आते ही मन भर आता है। क्या दिन थे वे! अच्छे थे या बुरे—यह प्रश्न अब अप्रासंगिक है, क्योंकि वे दिन अपने थे। बारिश में भीगते हुए भुट्टे खाना, खेतों में सरसों के पीले फूलों को निहारना, मटर और गन्ने को खेत से तोड़कर खाना—ईश्वर के दिए अन्न का वह स्वाद आज भी स्मृतियों में ताज़ा है।
बारिश के बाद मिट्टी की सोंधी महक, महुआ की ख़ुशबू से गमकती धरती, सड़क पर महुआ बीनते बच्चे—प्रकृति जैसे अपना ख़ज़ाना बिना मूल्य लुटा रही थी। हम सब उस वरदान के साक्षी थे।
विक्रम-बेताल, पंचतंत्र, चाचा चौधरी, नंदन, पराग—इन्हीं कहानियों ने हमारे संस्कार गढ़े। तब पिज़्ज़ा-बर्गर नहीं थे, काला खट्टा और लेमन चूस थे। स्वाद बदले हैं, शायद बेहतर भी हुए हैं, लेकिन दस पैसे में पाँच का जादू आज भी मन में जीवित है।
फिर पढ़ाई आई, किताबें बदलीं, विषय बदले, और बचपन अस्सी के दशक से बाहर निकल आया। गर्मियों में आम-लीची-जामुन और सर्दियों में गोभी, धनिया, गाजर का हलवा—ये स्वाद समय की स्मृति में सुरक्षित हैं।
पीपल और बरगद के झूलों से आसमान छूने का सपना देखते हुए आज हवाई जहाज़ से नीचे झाँकते हैं तो समझ आता है—हम वास्तव में कितने छोटे थे।
समय बदला, समाज आगे बढ़ा। हरियाली सीमेंट में बदलती गई। तरक़्क़ी हुई, पर उसकी कीमत भी चुकानी पड़ी—कटते जंगल, रोते पंछी, दहकती धरती। विज्ञान चाँद से मंगल तक पहुँच गया, लेकिन मानवीय संवेदना सिमटती चली गई।
फिर भी आशा शेष है। चिकित्सा, विज्ञान और वैश्विक सहयोग ने कोरोना जैसी आपदा में वसुधैव कुटुम्बकम् को चरितार्थ किया। भारत सहित विश्व जिस गति से आगे बढ़ रहा है, वह भविष्य के प्रति विश्वास जगाता है।
शाम ढल रही है। शहर के शोर से निकलकर मैं एक पगडंडी पर मुड़ता हूँ। पेड़ों के पीछे सुरमई सूरज गोधूलि में विलीन हो रहा है। गाड़ी में गीत बज रहा है—
“दिल ढूंढ़ता है फिर वही,
फ़ुरसत के रात दिन…”
एक नन्ही-सी तितली गाड़ी के चारों ओर मंडरा रही है।
शायद उसे पता चल गया है—
मैं अपने घर लौट रहा हूँ।🙏💖

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