Tuesday, 31 December 2019

.... आनेवाले साल को सलाम , जानेवाले साल को सलाम।..... 

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आसमाँ की ऊँचाई पाना हममें से हर कोई चाहता है लेकिन उड़ान भरने लायक तैयारी कितने लोग कर पाते हैं, यह सोचने का विषय है।

सभी की तमन्ना रहती ही है कि हर दृष्टि से हमारा कद, पद और प्रतिष्ठा बढ़े, हमारा व्यक्तित्व आसमान की ऊँचाइयां प्राप्त करे, और वह मुकाम पाए कि दुनिया में जहाँ कहीं पर हों, अपेक्षाकृत उच्च से उच्च स्थान पाते रहें और निरन्तर शीर्ष पर रहने का आनंद पाते रहें।

यह शीर्ष बादलों और आसमान की तरह होना चाहिए जहाँ रहकर हम जमाने भर को देख भी सकें, आनंद भी पा सकें और दूसरों को आनंद से सरोबार भी कर सकें।

अपना यह आनंद किसी का मोहताज न रहे, स्वेच्छा और संप्रभुता से हमें सब कुछ प्राप्त होता रहे। हम भी आनंदित होते रहें, औरों को भी जी भर कर आनंदित करते रहेंं।

सभी को सामूहिक ऊँचाइयों को पाने के अवसर प्राप्त हों, किसी को किसी दूसरे से ईष्र्या या भय न रहे, सभी लोग अपने-अपने हिसाब से आगे बढ़ते रहें, काम करते रहें और दुनिया को वह सब कुछ दे सकें जिसके लिए हमारा अवतरण हुआ है।

हर साल के आखिर में आज के दिन हम सोचते हैं कि आने वाले कल से कुछ नया करेंगे, कर दिखाएंगे और हर साल नया-नया करते हुए अपने आपको भी निखारेेंगे तथा जमाने भर को निखारने के लिए भी कुछ करेंगे ही।

जो आसमान की ऊँचाइयों को पाने के इच्छुक हैं उनके लिए सबसे बड़ी और अनिवार्य शर्त यही है कि हमारे पास ऎसा कोई भारी सामान न हो, जिससे कि उड़ पाने में किसी भी प्रकार की कोई दिक्कत न हो।

जो जितना अधिक हल्का होता है वह उतने अधिक ऊँचे तक उड़ान भर सकता है, सारा जहां एक ही निगाह में देख पा सकता है और दुनिया भर में अपने आपको मुक्त एवं मस्त होकर वह सब कुछ पा सकता है जिसे देख पाने और अनुभव करने के लिए बरसों से तमन्नाएं संजोयी होती हैं। इस मामले में इंसान को पंछियों का स्वभाव अपनाना चाहिए। न कहीं किसी से मोह, न अपेक्षा या उपेक्षा।

आज का इंसान इतना अधिक सामथ्र्यशाली है कि वह कुछ भी कर सकता है, आसमान की उड़ान से लेकर आक्षितिज पसरे नैसर्गिक वैभव को पा सकता है लेकिन यह सब तभी संभव है जबकि उसके मन-मस्तिष्क और तन में भारी तत्वों का बोझ न हो।

आजकल जो इंसान इस बोझ से मुक्त है वही ऊँचाइयों को पा सकता है। लेकिन अधिकांश लोग ऎसा नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि वे बिना किसी जरूरी कारकों के बोझ के कारण भारी से भारी हो गए हैं इस कारण उड़ान भर पाने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।

साल का आज आखिरी दिन है। इस दिन हर इंसान यही प्रण लेता है कि जो हो गया वो हो गया, अब कल से वह सब नहीं होने देगा। लेकिन वह कल कभी नहीं आता है। हम सभी के लिए आज का दिन अंतिम है, इस मायने में कि कल से नया वर्ष आरंभ होगा और इस नए साल में हम कुछ नया करना चाहते हैं, आसमान की ऊँचाई पाना चाहते हैं।

इस दृष्टि से हम सभी को चाहिए कि जीवन में बुराइयों, नीचता, अंधकार, काम, क्रोध, लोभ, मद-मात्सर्य, भाई भतीजावाद, बेईमानी, भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, अनैतिकता, सिद्धान्तहीनता, दुष्टता, आसुरी भावों, विघ्नसंतोष, नालायकियों और तमाम प्रकार की नकारात्मकताओं का भार लेकर हम ऊँचाइयों को प्राप्त नहीं कर सकते, उड़ान नहीं भर सकते।

क्यों न हम आज के दिन इन सभी प्रकार के भारों से मुक्त होने का प्रयास करें और एक-एक कर सारे बोझ त्यागते चले जाएं ताकि हम अनावश्यक बोझ से मुक्त होकर इतने हल्के हो जाएं कि जीवन में भारीपन और किसी भी प्रकार की बोझिलता रहे ही नहीं, आसमान में उड़ने लायक हल्कापन आ जाए और पूरी दुनिया को अपनी मानकर निहारते चले जाएं।

आज का दिन हमारे इसी संकल्प को पूरा करने के लिए है। आईये हमारे सारे अनावश्यक बोझ के लबादों को उतार फेंके और कल से नई उड़ान भरने के लिए तैयार हो जाएं।

आखिर वक्त आ ही गया है
बोझ त्यागने का !

कामोद रंजन 

Wednesday, 25 December 2019

शहंशाह-ए-तरन्नुम'
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हिन्दी सिनेमा के श्रेष्ठतम पार्श्वगायकों में से एक थे पद्मश्री स्वर्गीय मुहम्मद रफी, जिन्होंने क़रीब 40 साल के फ़िल्मी गायन में 25 हज़ार से अधिक गाने रिकॉर्ड करवाए। अपनी आवाज़ की मधुरता और परास की अधिकता के लिए इन्होंने अपने समकालीन गायकों के बीच अलग पहचान बनाई थी।

मुहम्मद रफ़ी का जन्म 24 दिसम्बर, 1924 को अमृतसर ज़िला, पंजाब में हुआ था। रफ़ी साहब ने बहुत कम उम्र से ही संगीत में रुचि दिखानी शुरू कर दी थी। बचपन में ही उनका परिवार लाहौर आ गया था। रफ़ी के बड़े भाई उनके लिए प्रेरणा के प्रमुख स्रोत थे। रफ़ी के बड़े भाई की अमृतसर में नाई की दुकान थी और रफ़ी बचपन में इसी दुकान पर आकर बैठते थे। उनकी दुकान पर एक फ़कीर रोज आकर सूफ़ी गाने सुनाता था। सात साल के रफ़ी साहब को उस फ़कीर की आवाज़ इतनी भाने लगी कि वे दिनभर उस फ़कीर का पीछा कर उसके गाए गीत सुना करते थे।

जब फ़कीर अपना गाना बंद कर खाना खाने या आराम करने चला जाता तो रफ़ी उसकी नकल कर गाने की कोशिश किया करते थे। वे उस फ़कीर के गाए गीत उसी की आवाज़ में गाने में इतने मशगूल हो जाते थे कि उनको पता ही नहीं चलता था कि उनके आसपास लोगों की भीड़ खड़ी हो गई है। कोई जब उनकी दुकान में बाल कटाने आता तो सात साल के मुहम्मद रफ़ी से एक गाने की फरमाईश जरुर करता।

क़रीब 15 वर्ष की उम्र में उन्हें संयोगवश सार्वजनिक प्रदर्शन का मौक़ा मिला, जो उनके जीवन में महत्त्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। श्रोताओं में प्रसिद्ध संगीतकार श्याम सुन्दर भी थे, जिन्होंने रफ़ी की प्रतिभा से प्रभावित होकर उन्हें फ़िल्मों में गाने के लिए बंबई (वर्तमान मुंबई) बुलाया।


रफ़ी ने अपना पहला गाना पंजाबी फ़िल्म 'गुल बलोच' के लिए गाया। बंबई में उन्होंने हिन्दी में शुरुआती गीत 'गाँव की गोरी' (1945), 'समाज को बदल डालो' (1947) और 'जुगनू' (1947) जैसी फ़िल्मों के लिए गाए। संगीतकार नौशाद ने होनहार गायक की क्षमता को पहचाना और फ़िल्म 'अनमोल घड़ी' (1946) में रफ़ी से पहली बार एकल गाना 'तेरा खिलौना टूटा बालक' और फिर फ़िल्म 'दिल्लगी' (1949) में 'इस दुनिया में आए दिलवालों' गाना गवाया, जो बहुत सफल सिद्ध हुए।


बाद के वर्षों में रफ़ी की माँग बेहद बढ़ गई। वह तत्कालीन शीर्ष सितारों की सुनहारी आवाज़ थे। उनका महानतम गुण पर्दे पर उनके गाने पर होंठ हिलाने वाले अभिनेता के व्यक्तित्व के अनुरूप अपनी आवाज़ को ढ़ालने की क्षमता थी। इस प्रकार 'लीडर' (1964) में 'तेरे हुस्न की क्या तारीफ़ करू' गाते समय वह रूमानी दिलीप कुमार थे, 'प्यासा' (1957) में 'ये दुनिया अगर मिल भी जाए, तो क्या है' जैसे गानों में गुरुदत्त की आत्मा थे, फ़िल्म 'जंगली' (1961) में 'या हू' गाते हुए अदम्य शम्मी कपूर थे और यहाँ तक कि 'प्यासा' में तेल मालिश की पेशकश करने वाले शरारती जॉनी वॉकर भी थे। हिन्दी फ़िल्म के प्रमुख समकालीन पार्श्व गायकों के साथ उनके युगल गीत भी उतने ही यादगार और लोकप्रिय हैं।

रफ़ी की शानदार गायकी ने कई गीतों को अमर बना दिया, जिनमें विभिन्न मनोभावों और शैलियों की झलक है। उनके गीतों के ख़ज़ाने में फ़िल्म 'कोहिनूर' (1907) का 'मधुबन में राधिका नाचे रे' और 'बैजू बावरा' (1952) का 'ओ दुनिया के रखवाले' जैसे शास्त्रीय गीत; फ़िल्म 'दुलारी' (1949) की 'सुहानी रात ढल चुकी' तथा 'चौदहवीं का चाँद' (1960) जैसी ग़ज़लें; 1965 की फ़िल्म 'सिकंदर-ए-आज़म' से 'जहाँ डाल-डाल पर', 'हक़ीक़त' (1964) से 'कर चले हम फ़िदा' तथा 'लीडर' (1964) से 'अपनी आज़ादी को हम जैसे आत्मा को झकझोरने वाले' देशभक्ति गीत; और 'तीसरी मंज़िल' (1964) का 'रॉक ऐंड रोल' से प्रभावित 'आजा-आजा मैं हूँ प्यार तेरा' जैसे हल्के-फुल्के गाने शामिल हैं। उन्होंने अंतिम गाना 1980 की फ़िल्म 'आसपास' के लिए 'तू कहीं आसपास है ऐ दोस्त' गाया था।

मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ में अद्भुत विस्तार था, जिसका संगीतकारों ने बख़ूबी इस्तेमाल किया। पूरी तीन पीढ़ियों तक अपनी आवाज़ देने वाले मोहम्मद रफ़ी का कहना था कि- "आवाज़ तो खुदा की देन है।" उनकी बात बिल्कुल सही है। क़रीब 25 कलाकारों को अपनी आवाज़ देने वाले मोहम्मद रफ़ी के गीत सुनते ही लोग जान जाते थे कि यह गीत किस पर फ़िल्माया गया होगा। फिर चाहे वे गुरुदत्त हों, शम्मी कपूर हों या फिर जॉनी वॉकर हों। इन सभी कलाकारों के लिए उनकी आवाज़ में एक विशेष तरह की लोच होती थी, जो उन्हें उस कलाकार से जोड़ देती थी। इसे मिमिक्री कदापि नहीं कहा जा सकता। यह तो उनकी स्वाभाविकता थी, जो हर तरह के कलाकार के लिए अपनी आवाज़ को ढाल लेते थे।

मुहम्मद रफ़ी उदार हृदय के व्यक्ति थे। कोई कभी उनके पास से ख़ाली हाथ नहीं जाता था। अपने शुरुआती दिनों में संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के लिए उन्होंने नाममात्र का मेहनताना लिया ताकि यह जोड़ी फ़िल्मी दुनिया में जम सके। गानों की रॉयल्टी को लेकर भी उनका एक अजब और उदार रवैया था। इसको लेकर उनका लता मंगेशकर से विवाद भी हो गया था। लता मंगेशकर का कहना था कि गाना गाने के बाद भी उन गानों से होने वाली आमदनी की रायल्टी गायकों-गायिकाओं को मिलना चाहिए। मगर उसूल के पक्के रफ़ी साहब इसके एकदम ख़िलाफ़ थे वे मानते थे कि एक बार गाने रिकॉर्ड हो गए और गायक-गायिकाओं को उनका पैसा मिलते ही बात खत्म हो जाती है। इस बात को लेकर दोनों में विवाद इतना बढ़ा कि दोनों ने एक साथ गीत नहीं गाए। बाद में नरगिस की पहल पर दोनों का विवाद सुलझा और दोनों ने एक साथ फ़िल्म 'ज्वैल थीफ' में 'दिल पुकारे' गीत गाया।

रफी साहब ने अगर अपनी इबादत का ख्याल रखा तो उन्होने कभी दूसरों को निराश नहीं किया । एक बेहतरीन गायक के साथ -साथ ईश्वर में भक्ति का मधुरतम सबूत भी दिया । उनके गाये भक्ति संगीत ने इस बात को भुला दिया कि कोई मुस्लिम गायक गा रहा है । संगीत वाकई आत्मा का विषय है और उन्होने इसे आत्मा से ही निभाया । उनके गाये भजन इस बात का जीवंत साक्ष्य हैं ।

भारत सरकार ने रफ़ी को 1965 में पद्मश्री से सम्मानित किया था। रफ़ी साहब 23 बार फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कारों के लिए नामित हुए, जिनमें 6 बार उन्हें यह पुरस्कार मिला।

रफ़ी साहब का निधन 31 जुलाई, 1980 को हुआ।


Monday, 16 December 2019


कुछ छोटी छोटी आदतें हैं जो मेरी है और शायद आपकी भी होनी चाहिये । ये बस इसलिये लिख रहा हूँ कि अगर आप ऐसा करते हो तो आपके लिये ढेर सारा प्यार और कोशिश करें वो जो ऐसा कर पाये ।


== सीढ़ी चढ़ते वक़्त अगर कोई बुज़ुर्ग धीरे धीरे चढ़ पा रहे हो सहारा ले के तो तेज़ आगे निकलने की जगह थोड़ा इंतज़ार कर लीजिए वो ख़ुद एक तरफ़ हट के आपको जाने को कहेंगे और उन्हें अच्छा लगेगा ।


==अगर पता आपको कोई बुज़ुर्ग तेज़ सुनते हैं तो खुद ही पहली बार में ऊँचा और धीरे बोलें उनको देखते हुये उन्हें अंदर से बुरा न लगेगा कि एक बार में समझ नहीं पाते वो ।

==कभी अगर बाज़ार में खुद के घर के या जान पहचान के कोई भले ही हल्के सामान को भी हाथों से पैदल ले जा रहें हो तो कोशिश करें वो सामान या हो पाये तो उन्हें घर तक पहुँचा दे । आपका थोड़ा वक्त जायेगा पर प्यार से उनका हाथ सर पे आयेगा ।
  
==एक वक्त तय होता जब उन्हें चाय पीने या कुछ खाने की आदत होती है और कभी कभी घर पे आप होते हो कोई और नहीं होता है तो अगर हो पाये चाय बना कर कुछ वक्त साथ बैठ जाइये जो बातें सुनने को मिलेगी मुस्कान खुद चेहरे पे खिलेगी ।

शेष बातें फिर कभी... 

कामोद कुमार सिंह  





  कुछ गीत, कुछ यादें और चंद मिसरों में सिमटा एक अधूरा अफ़साना कभी-कभी लगता है, पूरी ज़िंदगी किसी लंबे उपन्यास की तरह नहीं, बल्कि कुछ गीतों, ...