Monday, 22 December 2025

 आस्तिकता, नास्तिकता और शांति की खोज

“जहाँ तर्क थक जाता है, वहीं से श्रद्धा की यात्रा शुरू होती है।”

एक समय था जब मैं स्वयं को लगभग नास्तिक मान बैठा था। तर्क, प्रश्न और जीवन की कठिन परिस्थितियाँ—सब कुछ जैसे ईश्वर से दूरी बना रहा था। तब लगता था कि जो दिखाई दे, वही सत्य है; जो सिद्ध न हो, उस पर विश्वास क्यों किया जाए? पर समय के साथ अनुभव ने सिखाया कि जीवन केवल तर्क से नहीं चलता। आज जीवन प्रभु के भरोसे चल रहा है और इस स्वीकार के साथ मन में एक गहरी शांति उतर आई है।

मैं यह बहस छेड़ना नहीं चाहता कि आस्तिक होना सही है या नास्तिक। यह लेख किसी निष्कर्ष को थोपने का प्रयास भी नहीं है। यह केवल एक अनुभव है—कि भक्ति मार्ग अपनाने से मन को एक आधार मिलता है। जीवन के उतार-चढ़ाव में जब सब कुछ डगमगाने लगता है, तब यह भरोसा संबल बन जाता है।

“दुख में ईश्वर को याद करना मजबूरी नहीं, मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है।”

नास्तिक होना वास्तव में आसान नहीं है। जीवन के झंझावात जब आते हैं, तो सबसे दृढ़ तर्क भी कमजोर पड़ने लगते हैं। ज़रा-सी असहायता में ईश्वर का आभास होने लगता है। जिनके पीछे परिवार है, जिम्मेदारियाँ हैं, अपनों की चिंता है—उनके लिए नास्तिकता अक्सर एक विचार भर रह जाती है, जीवन का स्थायी दर्शन नहीं बन पाती।

भक्ति मार्ग मुझे प्रभु के निकट पहुँचने का सबसे सरल और सहज रास्ता लगता है। कर्म, ज्ञान और योग—ये सभी मार्ग महत्त्वपूर्ण हैं, पर भक्ति उन्हें जोड़कर हृदय से जोड़ देती है। भक्ति में न तो अधिक तर्क की आवश्यकता होती है, न ही बौद्धिक प्रदर्शन की। यहाँ केवल समर्पण है।

“अंततः ईश्वर की खोज में निकला मनुष्य, भक्त होकर ही लौटता है।”

धन्य हैं वे लोग, जिन्होंने बिना अधिक भटके भक्ति मार्ग चुन लिया। अन्यथा अधिकांश लोग जीवन भर ईश्वर को खोजते रहते हैं—कभी दर्शन में, कभी शास्त्रों में, कभी प्रश्नों में। और जब अंततः ईश्वर का अनुभव होता है, तो वह अनुभव भक्त बना देता है।

हमारे एक शिक्षक कहा करते थे—नास्तिक व्यक्ति का मन बहुत प्रबल होता है। आस्तिकता जीवन के कई दुखों को सहज बना देती है, पर नास्तिक व्यक्ति अक्सर हर संघर्ष अकेले झेलता है। शायद इसलिए कि वह हर उत्तर स्वयं ढूँढना चाहता है, हर पीड़ा स्वयं सहना चाहता है।

“विज्ञान प्रश्न सिखाता है, अध्यात्म उत्तर की अनुभूति।”

यदि गणित और विज्ञान को गहराई से पढ़ा जाए, तो पूर्ण नास्तिक होना कठिन हो जाता है। कुछ समय के लिए भ्रम हो सकता है, प्रश्न उठ सकते हैं, पर अंततः यह समझ विकसित होती है कि विज्ञान और अध्यात्म विरोधी नहीं हैं। वे एक ही गाड़ी के दो पहिए हैं—एक तर्क का, दूसरा अनुभूति का।



अंत में प्रश्न यह नहीं कि हम आस्तिक हैं या नास्तिक। वास्तविक प्रश्न यह है कि हमें मन की शांति कहाँ मिलती है। यदि भक्ति हमें वह शांति देती है, तो वही हमारा मार्ग है।

ओ३म् शान्तिश् शान्तिश् शान्तिः!🙏🎕😐

 

दिल ढूंढ़ता है फिर वही… फ़ुरसत के कुछ पल

दिल ढूंढ़ता है फिर वही…
फ़ुरसत के चार दिन।

पर प्रश्न यही है—वे चार दिन कौन से हैं?
कब मिलते हैं, और कब तक हमारे रहते हैं?

शायद यही वे पल हैं, जिनकी तलाश में मनुष्य पूरी उम्र भटकता रहता है। जब बहादुर शाह ज़फ़र अपने महल को आख़िरी बार निहार रहे थे—तख़्त जा चुका था, साम्राज्य बिखर चुका था—तब उनकी ज़ुबान से निकला यह दर्द आज भी समय की छाती पर दर्ज है—

“उम्र-ए-दराज़ मांग के लाई थी चार दिन,
दो आरज़ू में कट गये, दो इंतज़ार में।”

ज़िंदगी पर बातें होती रही हैं और होती रहेंगी। ज़िंदगी चलती रही है और चलती रहेगी। हम भी शायद यूँ ही ज़िंदगी का साथ निभाते रहेंगे, जब तक ज़िंदगी हमें अपने साथ लेकर चलती है—बिना शर्त, बिना किसी हिसाब-किताब के।

किसी शायर ने कहा था—
“उन्हें नफ़रत हुई सारे जहाँ से,
नई दुनिया कोई लाए कहाँ से।”

और उसी धरातल पर फ़िराक़ गोरखपुरी की पंक्तियाँ उम्मीद जगाती हैं—
“ये माना ज़िंदगी है चार दिन की,
बहुत होते हैं यारों चार दिन भी।”

एक ओर उम्मीद से भरा शायर है, दूसरी ओर इतिहास में विलीन होता एक हारा हुआ बादशाह। ज़िंदगी इन्हीं दो सिरों के बीच झूलती रहती है।

आज मैं अपने पुश्तैनी घर, अपने लोगों से मिलने जा रहा हूँ। बहुत समय बीत गया वहाँ गए हुए। न जाने कैसा होगा अब वह घर, वह मुहल्ला, वह गाँव। मन में अपार ख़ुशी है, तो कहीं भीतर एक हल्का-सा भय भी।

परिवर्तन जीवन का शाश्वत सत्य है—होना भी चाहिए। लेकिन छोटे शहरों का सुकून बड़े शहरों में परछाईं की तरह हमारे साथ चलता है। वह धीरे-धीरे आँखों पर हाथ रखकर झाँकता है कि कहीं उन्नति की चकाचौंध में हमारी दृष्टि कुंद न हो जाए।

घर की याद आते ही मन भर आता है। क्या दिन थे वे! अच्छे थे या बुरे—यह प्रश्न अब अप्रासंगिक है, क्योंकि वे दिन अपने थे। बारिश में भीगते हुए भुट्टे खाना, खेतों में सरसों के पीले फूलों को निहारना, मटर और गन्ने को खेत से तोड़कर खाना—ईश्वर के दिए अन्न का वह स्वाद आज भी स्मृतियों में ताज़ा है।

बारिश के बाद मिट्टी की सोंधी महक, महुआ की ख़ुशबू से गमकती धरती, सड़क पर महुआ बीनते बच्चे—प्रकृति जैसे अपना ख़ज़ाना बिना मूल्य लुटा रही थी। हम सब उस वरदान के साक्षी थे।

विक्रम-बेताल, पंचतंत्र, चाचा चौधरी, नंदन, पराग—इन्हीं कहानियों ने हमारे संस्कार गढ़े। तब पिज़्ज़ा-बर्गर नहीं थे, काला खट्टा और लेमन चूस थे। स्वाद बदले हैं, शायद बेहतर भी हुए हैं, लेकिन दस पैसे में पाँच का जादू आज भी मन में जीवित है।

फिर पढ़ाई आई, किताबें बदलीं, विषय बदले, और बचपन अस्सी के दशक से बाहर निकल आया। गर्मियों में आम-लीची-जामुन और सर्दियों में गोभी, धनिया, गाजर का हलवा—ये स्वाद समय की स्मृति में सुरक्षित हैं।

पीपल और बरगद के झूलों से आसमान छूने का सपना देखते हुए आज हवाई जहाज़ से नीचे झाँकते हैं तो समझ आता है—हम वास्तव में कितने छोटे थे।

समय बदला, समाज आगे बढ़ा। हरियाली सीमेंट में बदलती गई। तरक़्क़ी हुई, पर उसकी कीमत भी चुकानी पड़ी—कटते जंगल, रोते पंछी, दहकती धरती। विज्ञान चाँद से मंगल तक पहुँच गया, लेकिन मानवीय संवेदना सिमटती चली गई।

फिर भी आशा शेष है। चिकित्सा, विज्ञान और वैश्विक सहयोग ने कोरोना जैसी आपदा में वसुधैव कुटुम्बकम् को चरितार्थ किया। भारत सहित विश्व जिस गति से आगे बढ़ रहा है, वह भविष्य के प्रति विश्वास जगाता है।

शाम ढल रही है। शहर के शोर से निकलकर मैं एक पगडंडी पर मुड़ता हूँ। पेड़ों के पीछे सुरमई सूरज गोधूलि में विलीन हो रहा है। गाड़ी में गीत बज रहा है—
“दिल ढूंढ़ता है फिर वही,
फ़ुरसत के रात दिन…”




एक नन्ही-सी तितली गाड़ी के चारों ओर मंडरा रही है।
शायद उसे पता चल गया है—
मैं अपने घर लौट रहा हूँ।🙏💖

Monday, 8 December 2025

पहला–पहला प्यार… पहली–पहली धड़कनें

मासूमियत से भरी एक स्मृति

छठी कक्षा की बात है—क्लास में वह नई-नई आई थी। लगभग पच्चीस बच्चों में बस छह लड़कियाँ। अस्सी का दशक… सरकारी स्कूल…जहाँ “बेटी पढ़ाओ” का नारा तब तक किसी के कानों तक पहुँचा ही नहीं था। ज़्यादातर माता-पिता की चिंता बस इतनी थी—“लड़की को जल्दी ब्याह देना है।”

लेकिन जैसे ही वह आई, हमारी क्लास का माहौल पल में बदल गया। देहाती सरकारी स्कूल के बच्चे अचानक “जी सर”, “यस मिस” बोलने लगे। काग़ज़ के गोले, चौक के बम—सब गायब।
मानो एक लड़की के आने भर से क्लास टीचर का वर्षों पुराना अनुशासन सपना सच हो गया। उसका नाम था --प्रीति। और सच कहूँ तो उसके प्रीत में पूरा क्लास डूब चुका था। 10–11 साल की वह नाजुक उम्र—

फड़कते बाजू, बढ़ती लंबाई, बदलती आवाज़…हर लड़का खुद को अमिताभ समझने लगा था और उसे—जया या नीतू। दो कसी हुई चोटियाँ, करीने की यूनिफॉर्म, आँखों में हल्का-सा काजल, गालों पर डिंपल और चाल में एक भोली-सी खनक—अगर क़यामत नहीं, तो कम भी नहीं।

लड़कियाँ उससे थोड़ी-सी जलतीं, लड़के उससे पूरी तरह जल उठते—प्यार की आग में! फिलहाल, ‘प्रीति’ का जलवा सिर चढ़कर बोल रहा था…और हम कैसे अछूते रहते?


शाम को खेलते-खेलते मेरे परम मित्र ‘गिरजेश’ (काल्पनिक नाम) ने कहा—“मित्र, कल बढ़िया कपड़ा पहनकर स्कूल आना है।”

बस, उसी दिन से डबल आयरन की हुई कमीज़, जमे हुए बाल, समय से पहले स्कूल पहुँचना—सब हमारी दिनचर्या बन गया। पिछली बेंच से धीरे-धीरे पहली बेंच तक की यात्रा शुरू हुई।

तीन दिनों में प्रगति शानदार—दो बार पानी की लाइन में उसने जगह दी, एक बार गिरी हुई कॉपी उठाकर “थैंक्यू” कहा। धड़कनें तेज़, कदम हल्के, सपने बड़े। पहला प्यार… होने नहीं दिया गया—करवा दिया गया!

होली आने वाली थी। सरकारी स्कूल में पिचकारी कहाँ…सो हम लोग फाउंटेन पेन की स्याही से ही एक-दूसरे को रंग देते। दोस्तों के उकसावे पर मैंने भी हिम्मत करके धीरे से उसके हाथ की पीठ पर नीली स्याही की एक हल्की रेखा खींच दी। वह चौंकी नहीं—बस मुस्कुरा दी। और बोली—“बस इतनी ही होली?”

उस मुस्कान ने मेरे भीतर रंगों की पूरी पिचकारी भर दी।

मैं अंदर से बहुत शर्मीला था। मंच, संगीत, भीड़—सबसे डरता था। पर एक दिन मित्र ने बताया—“प्रीति बहुत अच्छा फिल्मी गीत गाती है!”

बस, यह सुनना था कि मेरी हिम्मत में भी एक छोटा-सा फूल खिल उठा। उस दिन मैं कार्यक्रम में भाग लेने तो क्या… चुपचाप पीछे दरवाज़े के पास खड़ा बस प्रीति को गाते सुनने आया था। अचानक मेरे मित्र ने भीड़ में खड़े होकर जोर-जोर से मेरा नाम पुकार दिया—“आमोद कहाँ है? आमोद… आमोद!”

मजबूरी में सामने आना पड़ा। दिल काँप रहा था। और फिर पहली बार गाया—“कोयल बोली, दुनिया डोली… समझो दिल की बोली…” (इससे पहले प्रीति ‘दुनिया में आए हैं तो जीना ही पड़ेगा’ गाकर गई थी।)

उस पल न भीड़ दिखी, न सभागार— बस एक ही सवाल—क्या प्रीति सुन रही होगी?

कार्यक्रम खत्म हुआ। टीचर ने कहा— “पहले लड़कियाँ बाहर निकलें।” प्रीति धीरे-धीरे चल रही थी। जैसे कुछ कहना चाहती हो। सीढ़ियों से उतरते हुए वह मेरे पास आई और धीमे से बोली— “तुम यह गीत मुझे लिखकर दोगे…?”

बस… उसी क्षण लगा पहला प्यार मन ही मन कुलांचे भर रहा था। उसके डिंपल जैसे और गहरे, आवाज़ जैसे और मीठी, और संसार जैसे अचानक बहुत सुंदर हो गया।

मैंने गीत लिखकर दे दिया। वह उसे छुपा-छुपा कर गुनगुनाती, और क्लास में हमारी नज़रें मिलते ही हल्की-सी मुस्कान बिखेर देती। लेकिन… हमारे मित्र ‘सुरेश’ (काल्पनिक नाम) को भनक लग गई। एक दिन उसने प्रीति के हाथ से वह कागज़ छीन लिया— और अगले दिन पूरे क्लास में फैला दिया। प्रीति रो पड़ी।टीचर आए और मुझे व मेरे एक और मित्र ‘रविंद’ को काफ़ी डाँटा और मारा भी। उसके कुछ ही दिनों बाद प्रीति के पिता का शहर में तबादला हो गया। और वह चली गई—हमारी दुनिया से भी।

हम सब मैट्रिक पास कर शहर में पढ़ने गए। पढ़ाई के साथ-साथ मन में बस एक ही लालसा— कहीं एक बार प्रीति दिख जाए। लेकिन यक़ीन मानिए— उस दिन के बाद प्रीति कभी नहीं मिली।

पहला प्यार… बस एक मीठी स्मृति बनकर दिल के किसी कोने में हमेशा के लिए थम गया..💖📚🏫

  कुछ गीत, कुछ यादें और चंद मिसरों में सिमटा एक अधूरा अफ़साना कभी-कभी लगता है, पूरी ज़िंदगी किसी लंबे उपन्यास की तरह नहीं, बल्कि कुछ गीतों, ...