Friday, 4 September 2026

आज शिक्षक दिवस  है।
हमारे जीवन को आकार देने वाले सभी शिक्षा-गुरुओं एवं शिक्षकों को सादर नमन।

आपका ज्ञान हमारी शक्ति है, आपके संस्कार हमारी पहचान हैं और आपका मार्गदर्शन हमारे जीवन की दिशा।

किताबों ने हमें अक्षर सिखाए, डिग्रियों ने दुनिया की भाषा समझाई; लेकिन ‘जीने’ का असली मर्म उस पाठशाला में मिला, जहाँ न कोई दीवारें थीं, न कोई तय पाठ्यक्रम—सिर्फ़ अनुभवों और सहयात्रियों की खुली कक्षा थी।

शिक्षक केवल वे नहीं होते जो हाथों में चाक और कलम लेकर श्यामपट्ट पर भविष्य उकेरते हैं। जीवन की इस लंबी यात्रा में सबसे सच्चे शिक्षक वे दिन भी रहे, जिन्होंने बिना किसी चेतावनी के हमारी परीक्षाएँ लीं; और वे लोग भी, जो किसी न किसी मोड़ पर हमारे हमसफ़र बने।

मुश्किल दौर और कड़वे अनुभव जीवन के सबसे कठोर गुरु सिद्ध हुए। जब कदम डगमगाए, अपनी बनाई योजनाएँ बिखर गईं और अकेले रास्तों के सन्नाटे में स्वयं से सामना हुआ, तब उसी टूटन ने जीवन के सबसे गहरे पाठ पढ़ाए।

उन ठोकरों ने अहंकार की परतें उतारीं, सीमाओं के भ्रम तोड़े और यह सिखाया कि जब सब कुछ पीछे छूट जाता है, तभी भीतर वास्तविक धैर्य जन्म लेता है। अभावों ने संतोष का मूल्य समझाया और अनिश्चितताओं ने यह बोध कराया कि परिस्थितियाँ चाहे जैसी हों, बहते रहना ही प्रकृति और जीवन का नियम है।

दूसरी ओर, सुखद अनुभवों और सहज पलों ने करुणामयी शिक्षक की तरह मन को सँभाला। किसी अजनबी की निस्वार्थ आत्मीयता, थका देने वाले सफ़र के बाद मिली छाँव, मौन में अनुभव होने वाली शांति और उम्मीद की एक हल्की-सी किरण—इन सबने सिखाया कि संसार में चाहे कितनी भी धूप क्यों न हो, अपने भीतर की करुणा को कभी सूखने नहीं देना चाहिए।

और नमन उन सभी सहयात्रियों को भी, जिन्होंने जाने-अनजाने हमें कुछ न कुछ सिखाया।

रास्ते में मिले हर व्यक्ति ने अपने हिस्से का एक पाठ सौंपा। कुछ ने साथ चलकर प्रेम, आत्मीयता और विश्वास का अर्थ समझाया; तो कुछ के बिछड़ जाने ने यह सिखाया कि वैराग्य और अकेले खड़े रहने का साहस भी जीवन का आवश्यक गुण है।

जिन्होंने हौसला दिया, उन्होंने आगे बढ़ना सिखाया; और जिनसे दूरियाँ बनीं, उन्होंने यह समझाया कि हर किसी की अपनी यात्रा है, इसलिए किसी ठहराव को स्थायी नहीं मानना चाहिए।

कुछ लोग आइना बनकर आए, जिन्होंने हमारी कमियाँ दिखाईं; तो कुछ संबल बनकर आए, जिन्होंने हमारी खोई हुई शक्ति लौटा दी।

जीवन की रीति सचमुच अनोखी है—यह पहले परीक्षा लेता है और सबक बाद में देता है।

आज शिक्षक दिवस पर कृतज्ञता उस धूप की भी, जिसने तपाकर निखारा; उस छाँव की भी, जिसने ठहरने का सुकून दिया; और हर उस सहयात्री की भी, जिसने राह में मिलकर ज़िंदगी को थोड़ा और गहरा, थोड़ा और स्पष्ट देखने की दृष्टि दी।

जब तक साँसें चल रही हैं, यह जीवन-यात्रा अनवरत चलती रहेगी और इसमें मिलने वाला हर अनुभव, हर व्यक्ति और हर किरदार हमें कुछ न कुछ सिखाता रहेगा।

इसी अर्थ में, हमारे जीवन की इस विराट पाठशाला में मिलने वाला हर अनुभव और हर सहयात्री किसी न किसी रूप में हमारा गुरु है।

शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ!

सभी गुरुओं एवं शिक्षकों को सादर प्रणाम और नमन। 🙏💐❣️

Monday, 18 May 2026


 

“‘मैं’ से ‘हम’ तक : सादगीपूर्ण वैवाहिक जीवन के 25 वर्षों का पावन संगम” 💐✨

जहाँ दो नदियाँ मिलकर संगम बनाती हैं, वह स्थान केवल भौगोलिक मिलन नहीं, बल्कि आस्था, पवित्रता और एकत्व का प्रतीक बन जाता है। ठीक उसी प्रकार विवाह भी दो व्यक्तियों का मात्र सामाजिक बंधन नहीं, बल्कि दो चेतनाओं, दो संस्कारों, दो जीवन यात्राओं का ऐसा पावन संगम है, जहाँ “मैं” और “तुम” का भाव धीरे-धीरे समाप्त होकर “हम” में परिवर्तित हो जाता है। अग्नि को साक्षी मानकर लिए गए सात फेरे केवल वचन नहीं होते, वे जीवन के प्रत्येक सुख-दुःख में साथ निभाने की एक मौन प्रतिज्ञा होते हैं।

आज हमारे वैवाहिक जीवन के 25 वर्ष पूर्ण हुए। यह रजत यात्रा केवल वर्षों की गणना नहीं, बल्कि धैर्य, विश्वास, समर्पण, सादगी और प्रेम की निरंतर साधना रही है। परमपूज्य गुरुदेव एवं देवाधिदेव महादेव से यही प्रार्थना है कि वे हमारे जीवन में अनुराग, उल्लास और आनंद का प्रकाश यूँ ही बनाए रखें तथा हमारे जीवन के प्रत्येक क्षण को उत्सव में रूपांतरित करने की शक्ति प्रदान करें।

मिले थे कुछ यूँ हम सफ़र में,
साथ जो चले तो लगा आज भी हम सफ़र में हैं…
और चाहत बस इतनी सी है कि
सफ़र-दर-सफ़र, हर जन्म में
हम यूँ ही एक-दूसरे के हमसफ़र
बने रहें…। ❤️

जब पीछे मुड़कर इन 25 वर्षों को देखता हूँ तो महसूस होता है कि जीवन की हर उपलब्धि के पीछे एक शांत, दृढ़ और अटूट शक्ति हमेशा खड़ी रही — “संजना”।
नौकरी और पेशे की व्यस्तताओं में जीवन का अधिकांश समय दायित्वों के निर्वहन में बीत गया। अनेक लोगों की समस्याओं के समाधान खोजते-खोजते शायद ही कभी अपने जीवन को ठहरकर जी पाया। कई बार मन हुआ कि थोड़ा समय निकालूँ, उनके साथ कहीं दूर चलूँ, कुछ पल सिर्फ अपने लिए जी लूँ, पर जिम्मेदारियों का सिलसिला कभी थमा ही नहीं।

लेकिन इन 25 वर्षों में उन्होंने कभी कोई शिकायत नहीं की। घर को सहेजा, रिश्तों में मधुरता बनाए रखी, बच्चों में संस्कारों की नींव डाली और हर उतार-चढ़ाव में चट्टान की तरह साथ खड़ी रहीं। जब मैं अपने कार्यों में व्यस्त रहा, तब वे मौन रहकर घर की हर जिम्मेदारी निभाती रहीं। मेरा निश्चिंत होकर अपने दायित्वों का निर्वहन कर पाना, उनके विश्वास, त्याग और धैर्य का ही परिणाम है।

आज इस विशेष अवसर पर मन में स्मृतियों का अथाह सागर उमड़ रहा है — कुछ संघर्षों की यादें, कुछ मुस्कुराते पल, कुछ अधूरे सपने और उन्हें पूरा करने का विश्वास। एक गहरा संतोष भी है कि जीवन की इस लंबी यात्रा में साथ कभी छूटा नहीं। समय बदलता रहा, परिस्थितियाँ बदलती रहीं, लेकिन हमारे बीच का विश्वास और अपनापन हर दिन और गहरा होता गया।

संजना, आपका मौन समर्पण ही मेरी सबसे बड़ी पूँजी है। आपने केवल एक पत्नी का दायित्व नहीं निभाया, बल्कि एक सच्चे मित्र, मार्गदर्शक और जीवनसाथी के रूप में हर मोड़ पर मेरा हाथ थामे रखा। शायद यही कारण है कि यह लंबा सफ़र कभी बोझ नहीं लगा। दोस्त के साथ चलने पर रास्ते कब कट जाते हैं, पता ही नहीं चलता… और जब वही दोस्त जीवनसाथी बन जाए तो जीवन सचमुच एक सुंदर उत्सव बन जाता है।

आओ सजन, आने वाले कल में
एक नया कल सजाएँ…
जो छूट गया था जीवन में,
उसे अब साथ मिलकर पूरा बनाएँ…
कुछ अपने, कुछ तुम्हारे सपनों का
एक नया जहान बसाएँ…

ज़िन्दगी की अनुभूतियाँ कभी पुरानी नहीं होतीं। समय बीत जाता है, पर कुछ स्मृतियाँ मन के किसी कोने में दीपक की लौ की तरह निरंतर जलती रहती हैं। कई बार लगता है कि जो पल हाथों से फिसल गए, वे कहीं दूर नहीं गए… वे आज भी वहीं खड़े हैं, उसी दहलीज़ पर, हमारी प्रतीक्षा में — कि कब हम लौटकर उन्हें फिर से जी लें।

वक्त ने सचमुच क्या हसीन सितम किया…
हम रहे न हम, तुम रहे न तुम…
और शायद यही विवाह का सबसे सुंदर रूप है।
जब एक पौधा अपने आँगन से निकलकर दूसरे आँगन में रोपा जाता है, तो धीरे-धीरे वहाँ की मिट्टी, हवा, पानी और स्नेह में ढलकर उसी आँगन का अभिन्न हिस्सा बन जाता है। समय के साथ वह पौधा वृक्ष बनता है और फिर उसका अस्तित्व अपने साथी से अलग नहीं रह जाता। एक-दूसरे के बिना जीवन अधूरा लगने लगता है।

आज हमारी शादी की 25वीं वर्षगाँठ पर यही अनुभव सबसे गहराई से महसूस हो रहा है कि जीवन के इस सफ़र में संजना केवल पत्नी नहीं, बल्कि मेरी सबसे अच्छी मित्र, मेरी प्रेरणा और मेरी सच्ची हमसफ़र रही हैं। शायद इसी कारण यह सफ़र इतनी सहजता से यहाँ तक पहुँच पाया।

अब तो बस यही तमन्ना है —
ज़िन्दगी की शाम उनकी बाँहों में हो,
और फिर उस सुबह की कोई शाम न हो…

आप सभी के स्नेह, आशीर्वाद और शुभकामनाओं के लिए हृदय से आभार।
ईश्वर से प्रार्थना है कि हमारे जीवन में यह विश्वास, यह स्नेह और यह मुस्कान यूँ ही बनी रहे…।

आज इन 25 वर्षों बाद महसूस होता है…

‘ हाँ तुम बिलकुल वैसी हो, जैसा मैंने सोचा था…’ ❤️” 

Saturday, 31 January 2026

 

क्यों धुँधला जाती है रिश्तों की यह गर्माहट ?

कृष्ण-दृष्टि से देखें जीवन के रिश्ते




भारतीय जीवन में रिश्तों की गर्माहट बहुत जल्दी जन्म लेती है। अपनापन, उत्साह, सम्मान और आत्मीयता—सब कुछ आरम्भ में जैसे एक साथ खिल उठता है। चाहे वह दाम्पत्य हो, परिवार के नए संबंध हों, मित्रता हो या कार्यस्थल के रिश्ते—शुरुआत अक्सर पूरी ऊर्जा और भावनात्मक उजास से भरी होती है।

पर उतनी ही सहजता से, कभी-कभी यह ऊष्मा धुँधली भी पड़ने लगती है।
जो संबंध कभी उत्सव थे, वे धीरे-धीरे औपचारिकता बन जाते हैं।
कभी-कभी यह ठंडापन खीझ, कटुता और अनकही शिकायतों का रूप ले लेता है।

प्रश्न स्वाभाविक है—
ऐसा क्यों होता है?
क्या रिश्तों का यह क्षरण अनिवार्य है?
और क्या इससे बाहर निकलने का कोई मार्ग है?

यदि हम जीवन के रिश्तों को कृष्ण के जीवन-दर्शन की कसौटी पर परखें, तो यह स्पष्ट होता है कि यह धुँधलापन न किसी एक व्यक्ति की विफलता है, न कोई दुर्भाग्य। यह संबंधों के स्वभाव की एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। इसे समझ लेने पर रिश्तों का बहुत-सा मानसिक बोझ अपने-आप हल्का हो जाता है।


पहला बिन्दु — आरम्भिक सम्मान का “अतिप्रकाश”

हर रिश्ता शुरुआत में एक विशेष चमक के साथ आता है।
नया विवाह, नई मित्रता, नया पद, नया सहयोग—इन सबमें एक तरह का “उत्सव-प्रधान सम्मान” होता है। लोग अधिक ध्यान देते हैं, अधिक शामिल करते हैं, अधिक उत्साह दिखाते हैं।

यह सम्मान नकली नहीं होता, पर टिकाऊ भी नहीं होता।
यह फुलझड़ी की तरह होता है—चमकदार, पर क्षणिक।

समस्या तब पैदा होती है जब यह आरम्भिक ऊँचाई व्यक्ति की स्थायी पहचान बन जाती है।
जब मन मान लेता है—
“यही मेरी वास्तविक कीमत है, यही व्यवहार मुझे हमेशा मिलना चाहिए।”

जैसे ही समय के साथ यह ऊष्मा स्वाभाविक रूप से कम होती है, व्यक्ति उसे अपमान या अवनति समझने लगता है।
यहीं से अहंकार का धुआँ उठता है।

कृष्ण की पहली सीख यही है—
भूमिकाएँ स्थायी नहीं होतीं; वे बदलती हैं। जो इस परिवर्तन को स्वीकार कर लेता है, वह हल्का रहता है।

गोकुल के बाल-कृष्ण और कुरुक्षेत्र के सारथी कृष्ण में आकाश-पाताल का अंतर है, फिर भी वे स्वयं से टकराते नहीं। वे अतीत की भूमिका से चिपके नहीं रहते।

जीवन के हर रिश्ते में यही सत्य लागू होता है।


दूसरा बिन्दु — सम्बन्धों का प्राकृतिक क्षय

मानव-सम्बन्ध स्थिर नहीं होते।
वे समय, परिस्थितियों, प्राथमिकताओं, उम्र, सामर्थ्य और दूरी से प्रभावित होते हैं।

जीवन के शुरुआती चरणों में रिश्तों पर अधिक ऊर्जा लगाई जाती है।
समय के साथ जिम्मेदारियाँ बढ़ती हैं—काम, स्वास्थ्य, परिवार, आर्थिक दबाव। ऐसे में वही भावनात्मक निवेश बनाए रखना सम्भव नहीं रह जाता।

यह किसी की कमी नहीं—यह जीवन का प्रवाह है।

महाभारत में कृष्ण हमें यह दिखाते हैं कि वे किसी भी सम्बन्ध में पूर्ण उपस्थिति की माँग नहीं करते।
वे वही भूमिका निभाते हैं, जिसकी उस समय आवश्यकता होती है—

कभी सखा,
कभी मार्गदर्शक,
कभी श्रोता,
कभी सारथी,
और कभी केवल मौन उपस्थिति।

यदि रिश्तों में भूमिकाएँ न बदलें, तो बंधन भारी हो जाते हैं।


तीसरा बिन्दु — अपेक्षाओं का बोझ

रिश्तों में विषाक्तता का सबसे बड़ा स्रोत है—अपेक्षा।

“वह पहले फ़ोन करे।”
“मेरी अहमियत समझे।”
“मेरे लिए वैसा ही व्यवहार करे जैसा पहले करता था।”

ये अपेक्षाएँ छोटी लगती हैं, पर भीतर से बहुत भारी होती हैं।

कृष्ण अर्जुन से कहते हैं—
“फल की अपेक्षा छोड़ दो; कर्म और सम्बन्ध दोनों हल्के हो जायेंगे।”

जब रिश्तों से अपेक्षाएँ घटती हैं,
तो स्थिरता बढ़ती है।
जहाँ अधिकार का दावा शुरू होता है,
वहीं टकराव जन्म लेता है।


चौथा बिन्दु — हास्य और हल्कापन

कृष्ण का एक अद्भुत गुण था—हर परिस्थिति में स्वयं को हल्का रखना।
मुस्कान, व्यंग्य, खेल—यह सब उन्हें संबंधों में बोझ नहीं बनने देता।

जो व्यक्ति अपने ऊपर हँस सकता है,
वह किसी रिश्ते में तनाव का कारण नहीं बनता।

गंभीरता जब आवश्यकता से अधिक हो जाती है,
तो entitlement जन्म लेता है—
और अधिकार की माँग रिश्तों को कठोर बना देती है।

हल्कापन रिश्तों को तरल बनाए रखता है।


पाँचवाँ बिन्दु — समय पर पीछे हटने की कला

कृष्ण जहाँ आवश्यकता होती है वहाँ उपस्थित रहते हैं,
और जहाँ उनकी उपस्थिति उलझाव बढ़ा सकती है, वहाँ वे पीछे हट जाते हैं।

यह जीवन का एक गहरा सूत्र है—
उपस्थिति भी एक कला है।

हर समय उपलब्ध रहना,
हर विषय पर राय देना,
हर रिश्ते में केंद्र बने रहना—
ये सब रिश्तों को थका देते हैं।

कभी-कभी थोड़ा पीछे हटना
रिश्ते को बचा लेता है।


छठा बिन्दु — रूपान्तरण को स्वीकार करना

कृष्ण का जीवन निरन्तर रूपान्तरण का उदाहरण है—
ग्वाला से राजनीतिज्ञ,
मित्र से मार्गदर्शक,
मानव से दार्शनिक।

वे कभी यह नहीं कहते—
“मैं वही रहूँगा जो पहले था।”

उनकी शक्ति ही उनका परिवर्तन है।

जीवन के हर रिश्ते में यही अपेक्षित है—
रूप बदलना,
स्वर बदलना,
भूमिका बदलना।

जो इसे स्वीकार कर लेता है,
वह रिश्तों को जीवित रखता है।


अंतिम निष्कर्ष

रिश्तों में ऊष्मा कम नहीं होती—
वह केवल अपना रूप बदलती है।

जो व्यक्ति इस बदलाव को अपमान नहीं,
परिपक्वता समझता है,
वह रिश्तों को विषाक्त होने से बचा लेता है।

कृष्ण का जीवन यही सिखाता है—
जो स्वयं को हल्का रखता है,
वह जीवन के भारी से भारी रिश्तों को भी सहज बना लेता है।

और जो स्वयं को केन्द्र मान लेता है,
वह किसी भी रिश्ते में धीरे-धीरे कठोर और धुँधला हो जाता है।

यही सत्य है—
सभी रिश्तों का।    

Friday, 9 January 2026

 सुहानी रात ढल चुकी ,न जाने तुम कब आओगे ..... दाशर्निक अर्थ!          =============================================

संसार बहुत विचित्र है और उतनी ही विचित्र है कवि, रचनाकारों की कल्पना ! विश्व के कण कण में एक संदेश है। सिर्फ उसे खोजने वाली बुद्धि चाहिये!
कोई लेखक, कवि, रचनाकार कुछ भी लिख देता है तो उसका अर्थ पढ़ने सुनने वाले की योग्यता और मानसिक क्षमता पर निर्भर करता है। ऐसा ही एक गीत गीतकार शकील बदायुनी साहब ने लिखा। 

आइये समझते हैं गीत सुहानी रात ढल चुकी का दार्शनिक अर्थ ......

रात्रि में मनुष्य नींद में रहता है, यह गफलत और बेहोशी की स्थिति होती है, उस समय प्राणी वास्तविकता से दूर होकर स्वप्नलोक में विचरण करता है। इसी प्रकार यह जीवन भी मोह निशा में फँसा है। मोह माया के परदे ने सबको अन्धकार में रखा हुआ है इसी अन्धकार से आत्मा प्रकाश में जाना चाहती है - 

"तमसो मा ज्योर्तिगमय, "

यह जीवन (सुखमय) सुहाना प्रतीत होता है और मनुष्य जीवन भर (रात भर) सुखद कल्पनाओं के स्वप्न देखता है और जैसे ही स्वप्न खत्म हुआ ? कहीं कुछ भी नही रहता है। जीवन भर दौड़-धूप आपा-धापी में जीवन बीत जाता है। अन्त में इस नश्वर असार संसार की मोह निशा से त्रस्त पस्त जीव मुक्ति की कामना और छटपटाहट में ईश्वर को पुकारता है, थकित श्रमित आत्मा ,सच्चिदानन्द परमात्मा को पुकारती है, भक्त अपने आराध्य को पुकारता है  -

सुहानी रात ढल चुकी ,न जाने तुम कब आओगे                                 
जहां की रूत बदल चुकी न जाने तुम कब आओगे।



पहले बपचन था, फिर जवानी आई, उसके बाद बुढ़ापा आया। सोच बदली , व्यवहार बदला ,रूचि बदली ,साथी बदले और जीवन के सब खेल बदल गये। यही बात है - 

जहां की रूत बदल चुकी ।                            
नजारे अपनी मस्तियाँ दिखादिखा के खो गए
सितारे अपनी रोशनी  लुटा लुटा के सो गए
हरेक शम्मा जल चुकी न जाने तुम कब आओगे।

जीवन ने बहुत सारे सुख-दुःख के रंग दिखाए, अच्छे बुरे बहुत नजारे दिखाए परन्तु अब वे नजारे खो चुके हैं और संसार की चमक दमक के सितारों की रोशनी लुट गई, खत्म हो चुकी है।  सभी इन्द्रियाँ थक चुकी जीवन के दिये में तेल खत्म होने लगा। सांसों की बाती खत्म होने की अवस्था में आ चुकी , यही तो है

हरेक शम्मा जल चुकी ....
तड़प रहे हैं हम यहाँ तुम्हारे इन्तजार में                                   
खिजां का रंग आ चला है मौसमें बहार में                                      
हवा भी रूख बदल चुकी न जाने तुम कब आओगे .. 

अब तो प्रभु दर्शन की प्यास है। मन तड़पत हरिदर्शन को आज, ईश्वर का ही तो इन्तजार है। जवानी की बहार खत्म हो चली , वृद्धावस्था की खिजां का रंग आ चला ! संसार की हवा भी रूख बदल चुकी ! जो कल तक दीवाने थे वे आज कतराने लगे हैं। जिस काया के बल पर नाज था वह जर्जर होने लगा है, साथी संगी बिछड़ गए, यही बात है -

हवा भी रूख बदल चुकी ...
अतः हे प्रभु  सुहानी रात ढल चुकी ,न जाने तुम कब आओगे ...    

शुभम भवतु! 🙏🧐

Monday, 22 December 2025

 आस्तिकता, नास्तिकता और शांति की खोज

“जहाँ तर्क थक जाता है, वहीं से श्रद्धा की यात्रा शुरू होती है।”

एक समय था जब मैं स्वयं को लगभग नास्तिक मान बैठा था। तर्क, प्रश्न और जीवन की कठिन परिस्थितियाँ—सब कुछ जैसे ईश्वर से दूरी बना रहा था। तब लगता था कि जो दिखाई दे, वही सत्य है; जो सिद्ध न हो, उस पर विश्वास क्यों किया जाए? पर समय के साथ अनुभव ने सिखाया कि जीवन केवल तर्क से नहीं चलता। आज जीवन प्रभु के भरोसे चल रहा है और इस स्वीकार के साथ मन में एक गहरी शांति उतर आई है।

मैं यह बहस छेड़ना नहीं चाहता कि आस्तिक होना सही है या नास्तिक। यह लेख किसी निष्कर्ष को थोपने का प्रयास भी नहीं है। यह केवल एक अनुभव है—कि भक्ति मार्ग अपनाने से मन को एक आधार मिलता है। जीवन के उतार-चढ़ाव में जब सब कुछ डगमगाने लगता है, तब यह भरोसा संबल बन जाता है।

“दुख में ईश्वर को याद करना मजबूरी नहीं, मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है।”

नास्तिक होना वास्तव में आसान नहीं है। जीवन के झंझावात जब आते हैं, तो सबसे दृढ़ तर्क भी कमजोर पड़ने लगते हैं। ज़रा-सी असहायता में ईश्वर का आभास होने लगता है। जिनके पीछे परिवार है, जिम्मेदारियाँ हैं, अपनों की चिंता है—उनके लिए नास्तिकता अक्सर एक विचार भर रह जाती है, जीवन का स्थायी दर्शन नहीं बन पाती।

भक्ति मार्ग मुझे प्रभु के निकट पहुँचने का सबसे सरल और सहज रास्ता लगता है। कर्म, ज्ञान और योग—ये सभी मार्ग महत्त्वपूर्ण हैं, पर भक्ति उन्हें जोड़कर हृदय से जोड़ देती है। भक्ति में न तो अधिक तर्क की आवश्यकता होती है, न ही बौद्धिक प्रदर्शन की। यहाँ केवल समर्पण है।

“अंततः ईश्वर की खोज में निकला मनुष्य, भक्त होकर ही लौटता है।”

धन्य हैं वे लोग, जिन्होंने बिना अधिक भटके भक्ति मार्ग चुन लिया। अन्यथा अधिकांश लोग जीवन भर ईश्वर को खोजते रहते हैं—कभी दर्शन में, कभी शास्त्रों में, कभी प्रश्नों में। और जब अंततः ईश्वर का अनुभव होता है, तो वह अनुभव भक्त बना देता है।

हमारे एक शिक्षक कहा करते थे—नास्तिक व्यक्ति का मन बहुत प्रबल होता है। आस्तिकता जीवन के कई दुखों को सहज बना देती है, पर नास्तिक व्यक्ति अक्सर हर संघर्ष अकेले झेलता है। शायद इसलिए कि वह हर उत्तर स्वयं ढूँढना चाहता है, हर पीड़ा स्वयं सहना चाहता है।

“विज्ञान प्रश्न सिखाता है, अध्यात्म उत्तर की अनुभूति।”

यदि गणित और विज्ञान को गहराई से पढ़ा जाए, तो पूर्ण नास्तिक होना कठिन हो जाता है। कुछ समय के लिए भ्रम हो सकता है, प्रश्न उठ सकते हैं, पर अंततः यह समझ विकसित होती है कि विज्ञान और अध्यात्म विरोधी नहीं हैं। वे एक ही गाड़ी के दो पहिए हैं—एक तर्क का, दूसरा अनुभूति का।



अंत में प्रश्न यह नहीं कि हम आस्तिक हैं या नास्तिक। वास्तविक प्रश्न यह है कि हमें मन की शांति कहाँ मिलती है। यदि भक्ति हमें वह शांति देती है, तो वही हमारा मार्ग है।

ओ३म् शान्तिश् शान्तिश् शान्तिः!🙏🎕😐

 

दिल ढूंढ़ता है फिर वही… फ़ुरसत के कुछ पल

दिल ढूंढ़ता है फिर वही…
फ़ुरसत के चार दिन।

पर प्रश्न यही है—वे चार दिन कौन से हैं?
कब मिलते हैं, और कब तक हमारे रहते हैं?

शायद यही वे पल हैं, जिनकी तलाश में मनुष्य पूरी उम्र भटकता रहता है। जब बहादुर शाह ज़फ़र अपने महल को आख़िरी बार निहार रहे थे—तख़्त जा चुका था, साम्राज्य बिखर चुका था—तब उनकी ज़ुबान से निकला यह दर्द आज भी समय की छाती पर दर्ज है—

“उम्र-ए-दराज़ मांग के लाई थी चार दिन,
दो आरज़ू में कट गये, दो इंतज़ार में।”

ज़िंदगी पर बातें होती रही हैं और होती रहेंगी। ज़िंदगी चलती रही है और चलती रहेगी। हम भी शायद यूँ ही ज़िंदगी का साथ निभाते रहेंगे, जब तक ज़िंदगी हमें अपने साथ लेकर चलती है—बिना शर्त, बिना किसी हिसाब-किताब के।

किसी शायर ने कहा था—
“उन्हें नफ़रत हुई सारे जहाँ से,
नई दुनिया कोई लाए कहाँ से।”

और उसी धरातल पर फ़िराक़ गोरखपुरी की पंक्तियाँ उम्मीद जगाती हैं—
“ये माना ज़िंदगी है चार दिन की,
बहुत होते हैं यारों चार दिन भी।”

एक ओर उम्मीद से भरा शायर है, दूसरी ओर इतिहास में विलीन होता एक हारा हुआ बादशाह। ज़िंदगी इन्हीं दो सिरों के बीच झूलती रहती है।

आज मैं अपने पुश्तैनी घर, अपने लोगों से मिलने जा रहा हूँ। बहुत समय बीत गया वहाँ गए हुए। न जाने कैसा होगा अब वह घर, वह मुहल्ला, वह गाँव। मन में अपार ख़ुशी है, तो कहीं भीतर एक हल्का-सा भय भी।

परिवर्तन जीवन का शाश्वत सत्य है—होना भी चाहिए। लेकिन छोटे शहरों का सुकून बड़े शहरों में परछाईं की तरह हमारे साथ चलता है। वह धीरे-धीरे आँखों पर हाथ रखकर झाँकता है कि कहीं उन्नति की चकाचौंध में हमारी दृष्टि कुंद न हो जाए।

घर की याद आते ही मन भर आता है। क्या दिन थे वे! अच्छे थे या बुरे—यह प्रश्न अब अप्रासंगिक है, क्योंकि वे दिन अपने थे। बारिश में भीगते हुए भुट्टे खाना, खेतों में सरसों के पीले फूलों को निहारना, मटर और गन्ने को खेत से तोड़कर खाना—ईश्वर के दिए अन्न का वह स्वाद आज भी स्मृतियों में ताज़ा है।

बारिश के बाद मिट्टी की सोंधी महक, महुआ की ख़ुशबू से गमकती धरती, सड़क पर महुआ बीनते बच्चे—प्रकृति जैसे अपना ख़ज़ाना बिना मूल्य लुटा रही थी। हम सब उस वरदान के साक्षी थे।

विक्रम-बेताल, पंचतंत्र, चाचा चौधरी, नंदन, पराग—इन्हीं कहानियों ने हमारे संस्कार गढ़े। तब पिज़्ज़ा-बर्गर नहीं थे, काला खट्टा और लेमन चूस थे। स्वाद बदले हैं, शायद बेहतर भी हुए हैं, लेकिन दस पैसे में पाँच का जादू आज भी मन में जीवित है।

फिर पढ़ाई आई, किताबें बदलीं, विषय बदले, और बचपन अस्सी के दशक से बाहर निकल आया। गर्मियों में आम-लीची-जामुन और सर्दियों में गोभी, धनिया, गाजर का हलवा—ये स्वाद समय की स्मृति में सुरक्षित हैं।

पीपल और बरगद के झूलों से आसमान छूने का सपना देखते हुए आज हवाई जहाज़ से नीचे झाँकते हैं तो समझ आता है—हम वास्तव में कितने छोटे थे।

समय बदला, समाज आगे बढ़ा। हरियाली सीमेंट में बदलती गई। तरक़्क़ी हुई, पर उसकी कीमत भी चुकानी पड़ी—कटते जंगल, रोते पंछी, दहकती धरती। विज्ञान चाँद से मंगल तक पहुँच गया, लेकिन मानवीय संवेदना सिमटती चली गई।

फिर भी आशा शेष है। चिकित्सा, विज्ञान और वैश्विक सहयोग ने कोरोना जैसी आपदा में वसुधैव कुटुम्बकम् को चरितार्थ किया। भारत सहित विश्व जिस गति से आगे बढ़ रहा है, वह भविष्य के प्रति विश्वास जगाता है।

शाम ढल रही है। शहर के शोर से निकलकर मैं एक पगडंडी पर मुड़ता हूँ। पेड़ों के पीछे सुरमई सूरज गोधूलि में विलीन हो रहा है। गाड़ी में गीत बज रहा है—
“दिल ढूंढ़ता है फिर वही,
फ़ुरसत के रात दिन…”




एक नन्ही-सी तितली गाड़ी के चारों ओर मंडरा रही है।
शायद उसे पता चल गया है—
मैं अपने घर लौट रहा हूँ।🙏💖

Monday, 8 December 2025

पहला–पहला प्यार… पहली–पहली धड़कनें

मासूमियत से भरी एक स्मृति

छठी कक्षा की बात है—क्लास में वह नई-नई आई थी। लगभग पच्चीस बच्चों में बस छह लड़कियाँ। अस्सी का दशक… सरकारी स्कूल…जहाँ “बेटी पढ़ाओ” का नारा तब तक किसी के कानों तक पहुँचा ही नहीं था। ज़्यादातर माता-पिता की चिंता बस इतनी थी—“लड़की को जल्दी ब्याह देना है।”

लेकिन जैसे ही वह आई, हमारी क्लास का माहौल पल में बदल गया। देहाती सरकारी स्कूल के बच्चे अचानक “जी सर”, “यस मिस” बोलने लगे। काग़ज़ के गोले, चौक के बम—सब गायब।
मानो एक लड़की के आने भर से क्लास टीचर का वर्षों पुराना अनुशासन सपना सच हो गया। उसका नाम था --प्रीति। और सच कहूँ तो उसके प्रीत में पूरा क्लास डूब चुका था। 10–11 साल की वह नाजुक उम्र—

फड़कते बाजू, बढ़ती लंबाई, बदलती आवाज़…हर लड़का खुद को अमिताभ समझने लगा था और उसे—जया या नीतू। दो कसी हुई चोटियाँ, करीने की यूनिफॉर्म, आँखों में हल्का-सा काजल, गालों पर डिंपल और चाल में एक भोली-सी खनक—अगर क़यामत नहीं, तो कम भी नहीं।

लड़कियाँ उससे थोड़ी-सी जलतीं, लड़के उससे पूरी तरह जल उठते—प्यार की आग में! फिलहाल, ‘प्रीति’ का जलवा सिर चढ़कर बोल रहा था…और हम कैसे अछूते रहते?


शाम को खेलते-खेलते मेरे परम मित्र ‘गिरजेश’ (काल्पनिक नाम) ने कहा—“मित्र, कल बढ़िया कपड़ा पहनकर स्कूल आना है।”

बस, उसी दिन से डबल आयरन की हुई कमीज़, जमे हुए बाल, समय से पहले स्कूल पहुँचना—सब हमारी दिनचर्या बन गया। पिछली बेंच से धीरे-धीरे पहली बेंच तक की यात्रा शुरू हुई।

तीन दिनों में प्रगति शानदार—दो बार पानी की लाइन में उसने जगह दी, एक बार गिरी हुई कॉपी उठाकर “थैंक्यू” कहा। धड़कनें तेज़, कदम हल्के, सपने बड़े। पहला प्यार… होने नहीं दिया गया—करवा दिया गया!

होली आने वाली थी। सरकारी स्कूल में पिचकारी कहाँ…सो हम लोग फाउंटेन पेन की स्याही से ही एक-दूसरे को रंग देते। दोस्तों के उकसावे पर मैंने भी हिम्मत करके धीरे से उसके हाथ की पीठ पर नीली स्याही की एक हल्की रेखा खींच दी। वह चौंकी नहीं—बस मुस्कुरा दी। और बोली—“बस इतनी ही होली?”

उस मुस्कान ने मेरे भीतर रंगों की पूरी पिचकारी भर दी।

मैं अंदर से बहुत शर्मीला था। मंच, संगीत, भीड़—सबसे डरता था। पर एक दिन मित्र ने बताया—“प्रीति बहुत अच्छा फिल्मी गीत गाती है!”

बस, यह सुनना था कि मेरी हिम्मत में भी एक छोटा-सा फूल खिल उठा। उस दिन मैं कार्यक्रम में भाग लेने तो क्या… चुपचाप पीछे दरवाज़े के पास खड़ा बस प्रीति को गाते सुनने आया था। अचानक मेरे मित्र ने भीड़ में खड़े होकर जोर-जोर से मेरा नाम पुकार दिया—“आमोद कहाँ है? आमोद… आमोद!”

मजबूरी में सामने आना पड़ा। दिल काँप रहा था। और फिर पहली बार गाया—“कोयल बोली, दुनिया डोली… समझो दिल की बोली…” (इससे पहले प्रीति ‘दुनिया में आए हैं तो जीना ही पड़ेगा’ गाकर गई थी।)

उस पल न भीड़ दिखी, न सभागार— बस एक ही सवाल—क्या प्रीति सुन रही होगी?

कार्यक्रम खत्म हुआ। टीचर ने कहा— “पहले लड़कियाँ बाहर निकलें।” प्रीति धीरे-धीरे चल रही थी। जैसे कुछ कहना चाहती हो। सीढ़ियों से उतरते हुए वह मेरे पास आई और धीमे से बोली— “तुम यह गीत मुझे लिखकर दोगे…?”

बस… उसी क्षण लगा पहला प्यार मन ही मन कुलांचे भर रहा था। उसके डिंपल जैसे और गहरे, आवाज़ जैसे और मीठी, और संसार जैसे अचानक बहुत सुंदर हो गया।

मैंने गीत लिखकर दे दिया। वह उसे छुपा-छुपा कर गुनगुनाती, और क्लास में हमारी नज़रें मिलते ही हल्की-सी मुस्कान बिखेर देती। लेकिन… हमारे मित्र ‘सुरेश’ (काल्पनिक नाम) को भनक लग गई। एक दिन उसने प्रीति के हाथ से वह कागज़ छीन लिया— और अगले दिन पूरे क्लास में फैला दिया। प्रीति रो पड़ी।टीचर आए और मुझे व मेरे एक और मित्र ‘रविंद’ को काफ़ी डाँटा और मारा भी। उसके कुछ ही दिनों बाद प्रीति के पिता का शहर में तबादला हो गया। और वह चली गई—हमारी दुनिया से भी।

हम सब मैट्रिक पास कर शहर में पढ़ने गए। पढ़ाई के साथ-साथ मन में बस एक ही लालसा— कहीं एक बार प्रीति दिख जाए। लेकिन यक़ीन मानिए— उस दिन के बाद प्रीति कभी नहीं मिली।

पहला प्यार… बस एक मीठी स्मृति बनकर दिल के किसी कोने में हमेशा के लिए थम गया..💖📚🏫

  कुछ गीत, कुछ यादें और चंद मिसरों में सिमटा एक अधूरा अफ़साना कभी-कभी लगता है, पूरी ज़िंदगी किसी लंबे उपन्यास की तरह नहीं, बल्कि कुछ गीतों, ...