Monday, 8 December 2025

पहला–पहला प्यार… पहली–पहली धड़कनें

मासूमियत से भरी एक स्मृति

छठी कक्षा की बात है—क्लास में वह नई-नई आई थी। लगभग पच्चीस बच्चों में बस छह लड़कियाँ। अस्सी का दशक… सरकारी स्कूल…जहाँ “बेटी पढ़ाओ” का नारा तब तक किसी के कानों तक पहुँचा ही नहीं था। ज़्यादातर माता-पिता की चिंता बस इतनी थी—“लड़की को जल्दी ब्याह देना है।”

लेकिन जैसे ही वह आई, हमारी क्लास का माहौल पल में बदल गया। देहाती सरकारी स्कूल के बच्चे अचानक “जी सर”, “यस मिस” बोलने लगे। काग़ज़ के गोले, चौक के बम—सब गायब।
मानो एक लड़की के आने भर से क्लास टीचर का वर्षों पुराना अनुशासन सपना सच हो गया। उसका नाम था --प्रीति। और सच कहूँ तो उसके प्रीत में पूरा क्लास डूब चुका था। 10–11 साल की वह नाजुक उम्र—

फड़कते बाजू, बढ़ती लंबाई, बदलती आवाज़…हर लड़का खुद को अमिताभ समझने लगा था और उसे—जया या नीतू। दो कसी हुई चोटियाँ, करीने की यूनिफॉर्म, आँखों में हल्का-सा काजल, गालों पर डिंपल और चाल में एक भोली-सी खनक—अगर क़यामत नहीं, तो कम भी नहीं।

लड़कियाँ उससे थोड़ी-सी जलतीं, लड़के उससे पूरी तरह जल उठते—प्यार की आग में! फिलहाल, ‘प्रीति’ का जलवा सिर चढ़कर बोल रहा था…और हम कैसे अछूते रहते?


शाम को खेलते-खेलते मेरे परम मित्र ‘गिरजेश’ (काल्पनिक नाम) ने कहा—“मित्र, कल बढ़िया कपड़ा पहनकर स्कूल आना है।”

बस, उसी दिन से डबल आयरन की हुई कमीज़, जमे हुए बाल, समय से पहले स्कूल पहुँचना—सब हमारी दिनचर्या बन गया। पिछली बेंच से धीरे-धीरे पहली बेंच तक की यात्रा शुरू हुई।

तीन दिनों में प्रगति शानदार—दो बार पानी की लाइन में उसने जगह दी, एक बार गिरी हुई कॉपी उठाकर “थैंक्यू” कहा। धड़कनें तेज़, कदम हल्के, सपने बड़े। पहला प्यार… होने नहीं दिया गया—करवा दिया गया!

होली आने वाली थी। सरकारी स्कूल में पिचकारी कहाँ…सो हम लोग फाउंटेन पेन की स्याही से ही एक-दूसरे को रंग देते। दोस्तों के उकसावे पर मैंने भी हिम्मत करके धीरे से उसके हाथ की पीठ पर नीली स्याही की एक हल्की रेखा खींच दी। वह चौंकी नहीं—बस मुस्कुरा दी। और बोली—“बस इतनी ही होली?”

उस मुस्कान ने मेरे भीतर रंगों की पूरी पिचकारी भर दी।

मैं अंदर से बहुत शर्मीला था। मंच, संगीत, भीड़—सबसे डरता था। पर एक दिन मित्र ने बताया—“प्रीति बहुत अच्छा फिल्मी गीत गाती है!”

बस, यह सुनना था कि मेरी हिम्मत में भी एक छोटा-सा फूल खिल उठा। उस दिन मैं कार्यक्रम में भाग लेने तो क्या… चुपचाप पीछे दरवाज़े के पास खड़ा बस प्रीति को गाते सुनने आया था। अचानक मेरे मित्र ने भीड़ में खड़े होकर जोर-जोर से मेरा नाम पुकार दिया—“आमोद कहाँ है? आमोद… आमोद!”

मजबूरी में सामने आना पड़ा। दिल काँप रहा था। और फिर पहली बार गाया—“कोयल बोली, दुनिया डोली… समझो दिल की बोली…” (इससे पहले प्रीति ‘दुनिया में आए हैं तो जीना ही पड़ेगा’ गाकर गई थी।)

उस पल न भीड़ दिखी, न सभागार— बस एक ही सवाल—क्या प्रीति सुन रही होगी?

कार्यक्रम खत्म हुआ। टीचर ने कहा— “पहले लड़कियाँ बाहर निकलें।” प्रीति धीरे-धीरे चल रही थी। जैसे कुछ कहना चाहती हो। सीढ़ियों से उतरते हुए वह मेरे पास आई और धीमे से बोली— “तुम यह गीत मुझे लिखकर दोगे…?”

बस… उसी क्षण लगा पहला प्यार मन ही मन कुलांचे भर रहा था। उसके डिंपल जैसे और गहरे, आवाज़ जैसे और मीठी, और संसार जैसे अचानक बहुत सुंदर हो गया।

मैंने गीत लिखकर दे दिया। वह उसे छुपा-छुपा कर गुनगुनाती, और क्लास में हमारी नज़रें मिलते ही हल्की-सी मुस्कान बिखेर देती। लेकिन… हमारे मित्र ‘सुरेश’ (काल्पनिक नाम) को भनक लग गई। एक दिन उसने प्रीति के हाथ से वह कागज़ छीन लिया— और अगले दिन पूरे क्लास में फैला दिया। प्रीति रो पड़ी।टीचर आए और मुझे व मेरे एक और मित्र ‘रविंद’ को काफ़ी डाँटा और मारा भी। उसके कुछ ही दिनों बाद प्रीति के पिता का शहर में तबादला हो गया। और वह चली गई—हमारी दुनिया से भी।

हम सब मैट्रिक पास कर शहर में पढ़ने गए। पढ़ाई के साथ-साथ मन में बस एक ही लालसा— कहीं एक बार प्रीति दिख जाए। लेकिन यक़ीन मानिए— उस दिन के बाद प्रीति कभी नहीं मिली।

पहला प्यार… बस एक मीठी स्मृति बनकर दिल के किसी कोने में हमेशा के लिए थम गया..💖📚🏫

Friday, 1 August 2025

कहीं दूर जब दिन ढल जाए साँझ की दुल्हन बदन चुराए चुपके से आए मेरे ख़यालों के आँगन में कोई सपनों के दीप जलाए, दीप जलाए कहीं दूर........


ये पंक्तियाँ सुनने से ही हमारे मन में प्यारी सी शाम की एक आकृति बन जाती है। जिसने जिस-जिस तरीके से इस संध्या बेला को अनुभव किया होता है वो उसी प्रकार से सुहानी शाम को मन में चित्रित करता है। हमारी तो हर मौसम की अलग-अलग तरह की शाम हुआ करती थी। गर्मियों के दिनों में धूप के ओझल होते ही दुआर (घर के बहार का हिस्सा) को बुहार कर साफ करके पानी छिड़क दिया जाता था। चारपाई बाहर निकालकर बिछा दी जाती थी। तपती धरती को जब ठंडा पानी की बुँदे छुती तो ऐसी मन मोहने वाली सुगंध उठती कि उसका मुकाबला महंगे से महंगा इत्र भी न कर सके। 

घर की बहू-बेटियां दीया जलाकर अचरा से लक्ष्मी स्वरूपा दीया का माथा टेक कर मुख्य द्वार के चौखट पर रख देती थी। घर के छोटे बच्चे की जिम्मेदारी होती थी कि लालटेन के शीशे को साफ करके चमका कर उसे जला कर बरामदे में टंगी कीली पर टांग दे। अपना चारा खाकर पेट भर चुके पालतू पशु शाम होते ही मालिक का बाट जोहने लगते थे कि मालिक आये और हमें नाद से हटाकर आराम करने वाले खूटे पर बांधे। खड़े होकर चारा खाते-खाते उनके भी पैर दुखने लगते होंगे। पशुओं के देखभाल करने में लगे लोग अपने इधर-उधर के काम निपटा कर पशुओं के पीने के लिए बाल्टी में पानी भरकर रख देते थे। 

स्वयं हाथ पैर धोकर बेना (हाथ का पंखा )लेकर सभी बच्चो को बुलाकर चारपाई पर घर की मालकिन (माँ /दादी) बैठ जाती थीं। नन्हें बच्चे दादी के पास चले जाते थे तब सुकून से बहुऍ अपनी ननद के साथ मिलकर रसोई संभाल लेती थी। घर के मुखिया भी, खेत या हाट बाजार का काम निपटा कर हाथ मुँह धोकर एक लोटा पानी पीकर, वहीँ चारपाई पर बैठकर रेडियो में समाचार,गीत सुनते और भोजन बनने की प्रतीक्षा करते और जैसे हिं ठाकुरवाड़ी (गांव के मंदिर) में ठाकुर जी की आरती के बाद भोग लग जाता फिर भोजन करते। 





बारिश के मौसम की शाम तो कभी-कभी बेहद चिपचिपी उमस भरी होती थी या फिर ठंडी-ठंडी फुहार पड़ने के बाद आत्मा तक को तृप्त करने वाली ठंडी हवाएं चलती। शाम होते ही मच्छरों का बोलबाला हो जाता। दीया बत्ती करने के बाद भोजन बनाने की बहुत जल्दी रहती थी क्योंकि इस मौसम में अक्सर कीट पतंगे, पाखी उठने का डर रहता है। पशुओं के साथ-साथ अपने नजदीक भी कुछ गीले कुछ सूखे उपले व भूसे का धुआँ किया जाता था ताकि मच्छरो को भगाया जा सके। 

शाम को जब सब दुआर (दरवाजे) पर इकट्ठा होकर बैठते थे तब भुजा (मक्का /चावल /चिउड़ा/चना भुना हुआ) खाया जाता था जो हम सबका उस समय का स्नैक्स होता था। किसी दिन बाहर ही उपले जलाकर भुट्टे (मक्की) भूने जाते थे और उनका आनंद लिया जाता था जिस दिन भुट्टे खाये जाते थे उस दिन सबकी भूख कम हो जाती थी तो भोजन में बस खिचड़ी बन जाती थी। 

सबसे मस्त सर्दियों की शाम होती थी। धूप ढलते ही बुजुर्गों और बच्चों के स्वेटर निकल आते थे। घर के किशोर बच्चे या मालकिन की ड्यूटी लगती थी कि शाम होने से पहले ही घुरा (अलाव) रख दिया जाय क्योंकि दिन ढलने के बाद बच्चे तुरंत उसे जलाने के लिए मचलने लगता थे। उसी घुरा में आलू, मटर की फली, शकरकंदी डाल दिए जाते थे। बच्चे बैठकर आग सेकते और इन भुनी हुई चीजों का आनंद लेते। रसोई संभालने वाली के मजे रहते थे चूल्हे पर भोजन बनता था और उसकी आग से गर्मी मिलती रहती थी। जब सब भोजन कर लेते तब रसोई संभालने वाली हाथ पैर धोकर अपने हाथ पैर घुरा /बोरसी से सेक कर गर्म करती फिर सोने जाती थी। 

हम सबका बचपन तो ऐसे ही बीता है हमारी शाम ऐसे ही हुआ करती थी। अब शहरों में तो कब सुबह हुई कब शाम आयी पता ही नहीं चलता है। सारे मौसम, सुबह शाम, देशी भोजन इन सब का आनंद लेना है तो गांव जाइये वहाँ न सिर्फ ये महसूस कर सकेंगे बल्कि उन्हें जीकर देखेंगे।😊

Wednesday, 16 July 2025

श्रद्धांजलि मेरे जीवन के सबसे बड़े मार्गदर्शक को

 संस्मरण_पुण्य_स्मरण🪴

श्रद्धांजलि मेरे जीवन के सबसे बड़े मार्गदर्शक को🙏

कुछ रिश्ते खून के नहीं होते, लेकिन उनका स्थान जीवन में किसी अपने से भी बढ़कर हो जाता है। मेरे फूफा जी (स्वर्गीय श्री जयनारायण सिंह) मेरे लिए वही थे। जब मैं बहुत छोटा था और बाबूजी का साया सिर से उठ गया, तब ज़िंदगी जैसे थम सी गई थी। लेकिन तभी उन्होंने न सिर्फ मुझे सहारा दिया, बल्कि मुझे अपना बेटा मानकर पाला-पोसा। मैंने उनका घर नहीं, अपना घर पाया — और उनके स्नेह, अनुशासन और संरक्षण में पूरे १० -१२  साल बिताए।

वो सख्त ज़रूर थे, लेकिन उनका दिल बेहद कोमल था। उनके हर डांट के पीछे मेरा भविष्य संवारने की चिंता छिपी होती थी। उन्होंने हमेशा मुझे सही राह दिखाने की कोशिश की — चाहे पढ़ाई हो, जीवन के मूल्य हों, या लोगों से व्यवहार। वे खुद बहुत साधारण जीवन जीते थे, लेकिन उनके विचार और संस्कार असाधारण थे। गाँव पंचायत में हर कोई उनका सम्मान करता था, क्योंकि वे सच्चाई, ईमानदारी और न्याय के प्रतीक थे।

वो कहा करते थे — “जीवन में कुछ भी बनो, लेकिन अच्छा इंसान जरूर बनना।” आज जब मैं अपने जीवन में कुछ भी अच्छा करता हूँ, तो उनकी कही ये बात सबसे पहले याद आती है। उनके दिए हुए जीवन मूल्यों और शिक्षा ने मुझे इस लायक बनाया कि मैं अपने पैरों पर खड़ा हो सका। आज जो कुछ भी मैं हूँ, जो भी पहचान बनी है मेरी, उसमें उनका हाथ सबसे बड़ा है। मैं उनका ऋणी हूँ — जन्मों-जन्मों तक।



"मुझे आज भी याद है जब मैंने I.C.W.A.I. (Institute of Cost & Works Accountants of India) का प्रवेश परीक्षा पास किया था, तो वे बहुत खुश हुए थे।' और बहुत हिं जिज्ञासा के साथ पूछे थे-- इसे पढ़कर इंसान क्या बनता है ? उस दिन पहली बार मुझे एहसास हुआ कि मैं अकेला नहीं हूँ — मेरे पास एक छाया है जो हमेशा मेरी रक्षा करेगी।"

"उन्होंने कभी अधिक साधन नहीं जुटाए, लेकिन अपनी ईमानदारी और मेहनत से जो सम्मान कमाया, वह आज भी गांव -पंचायत, सगे -सम्बन्धियों के लिए प्रेरणा है। उन्होंने अपने सिमित संसाधन के साथ तथा छोटे जमीन के टुकड़े को कर्मभूमि बनाकर दिखाया कि लगन और निष्ठा से हर सपना पूरा किया जा सकता है।"

"आज मैं जो कुछ भी सोच पा रहा हूँ या लिख पा रहा हूँ , तो लगता है मानो मैं उन्हीं के शब्द दोहरा रहा हूँ। उन्होंने मेरे ज़ेहन में जो बीज बोए थे, वही अब मेरी सोच और व्यवहार में फल-फूल रहे हैं।"

आज वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी यादें, उनकी सीखें, और उनका आशीर्वाद हमेशा मेरे साथ रहेगा। उनके बिना जीवन अधूरा सा लगता है, लेकिन उनके द्वारा सिखाया हर पाठ मुझे आगे बढ़ने की हिम्मत देता है।

फूफा जी को मेरी ओर से भावभीनी श्रद्धांजलि। आपका स्थान मेरे जीवन में कोई नहीं ले सकता। आप हमेशा मेरी आत्मा में जिंदा रहेंगे। 

आज भी जब कभी मैं उच्च या तुच्छ के दंश से पीड़ित होता हूँ तब यह संस्मरण मेरे चित्त को स्वच्छ कर मुझे जीवन के प्रति आदर, आनंद और उत्साह से भर देता है।~ कामोद कुमार सिंह 🙏🥀🎕


Saturday, 12 July 2025

"वो प्यार था या कुछ और था .."

"वो प्यार था या कुछ और था ..."

वो मुहल्ले के जवान, छैल-छबीले लड़के होते थे—जिन्हें बारातियों को खिलाने की जिम्मेवारी दी जाती। कमबख़्त ये काम वे सिर्फ़ इसलिए पकड़ लेते कि आख़िरी पंगत हमेशा घर–मुहल्ले और रिश्तेदारी की लड़कियों की होती। थकान से चूर होने के बाद भी इनकी आँखों में बिजली-सी चमक रहती। बस चाहते कि जैसे ही लड़कियाँ बैठें, #शारदा सिन्हा के गाने हवा में गूंज उठें… बैठने की जगह ऐसे सजी हो जैसे चौका, और घर के चाचा-भाई कहीं दूर रहें—बस पास न आएँ।

वे ऐसी जगह चांदनी बिछा देते, जहाँ लड़कियों के कदम पड़ें तो धरती भी खिल उठे। और जब लड़कियाँ आतीं—सौगात की तरह, जैसे जीवन में अचानक बसंत उतर आया हो, जैसे किसी के देह पर पलाश रंग गया हो। दुपट्टे में चेहरा छुपाए उनकी वह धीमी-सी मुस्कान… और उधर लड़के—पत्तल क्या बिछाते, खुद ही बिछ जाते।
कढ़ाई से निकली सबसे गरम, सुनहरी पूड़ियाँ वे इस अदब से परोसते जैसे दिल परोस रहे हों। आँखें भले न मिलती हों, पर इतनी नज़दीकी… शायद ज़िंदगी में फिर कभी नहीं मिलनी।

कसोरे में जितनी बार "बस कीजिए" कहा जाता, उतनी ही बार दही–बूंदी बढ़ जाती। कुछ लड़कियाँ खास होतीं, और कुछ लड़के भी। इशारों में ही ‘हमारी वाली’ और ‘उसकी वाली’ का बंटवारा हो जाता, और पंगत एक संगीत-सभा जैसी लगती—जिसका अंत न हो।

लड़कियाँ चिड़िया-सी खाते हुए, गिलहरी-सी पूड़ी कुतरती हुई हँसतीं, और लड़के बाल्टियों में खाना लिए बार-बार उनके पास आते।
रामबन वाली भाभी की बहन कल चली जाएगी—यह सोचकर एक लड़का खाली बाल्टी लिए ही उसके पास ठहर जाता। धीरे से कहता—
“सुनो… कल चली जाओगी।”
लड़की लाल पड़ जाती, फिर शरारत से पूछती—
“बाल्टी में तरकारी है क्या? दो न!”
लड़का झेंप जाता—बाल्टी तो खाली है। और लड़की खिलखिलाकर हँस पड़ती।


यह पंगत लड़कों की उम्र बढ़ाने वाली थी।
इशारों में “ऑल द बेस्ट” कहना, ज़रा झुककर घुंघराले बालों में उँगलियाँ फेर देना…
कसोरे में दिल परोसा जा रहा था, पूड़ियों की गर्मी फूँककर दी जा रही थी।
कुछ जूठी पत्तलों पर लड़कियों की नाज़ुक उँगलियों की छुवन रह जाती—और लड़के उन पत्तलों को ऐसे सम्हालकर उठाते जैसे कोई प्रसाद उठा रहे हों। कुछ पूड़ी के छोटे टुकड़े चुपके से खा भी लेते—जैसे उसमें लड़की की मुस्कान बसी हो।

चप्पलों की भीड़ में कुछ लड़के अपनी वाली का चप्पल थामे साइड में खड़े रहते। देह की गंध, पास आती साँसें—इन सबके नशे में डूबे हुए। तभी एक लड़की अपना चेहरा पोंछा रूमाल किसी लड़के की मुट्ठी में ठूँस कर भाग जाती।
पंगत उठ चुकी होती, दीवाने थक चुके होते। घर वाले चाहते कि ये लड़के अब चैन से खा लें—पर ये तो अपनी ही दुनिया में मगन, अनंत आनंद में लिपटे रहते।

वही एक लड़का था—जो भाभी की बहन का जूठा पत्तल मोड़कर छुपा लेता और कहता—
“इसी में खाना खाऊँगा…”
उस जूठे पत्तल में लड़की की झिझकती नज़र थी, उसकी उँगलियों की हल्की छुअन थी।
मन तो करता था उसकी एक उँगली को दाँत से हल्का-सा काट ले—पर इसी सोच से एक उफ़्फ़ जन्म लेती, एक आह-सी बिछड़न फैल जाती।

"वो प्यार था या कुछ और था…"

न तुझे पता, न मुझे पता,
ये निगाहों का ही कसूर था—
न तेरी ख़ता, न मेरी ख़ता।

हम नहीं जानते आने वाले दिन कैसे होंगे—अच्छे या बुरे।
यह भी नहीं पता कि हम जिंदा रहेंगे भी या नहीं।
पर इतना ज़रूर है—कि बीते दिनों का सुख, वे छोटे-छोटे पल…
हमेशा हमारे चेहरों पर चमक बनकर रहेंगे।
दुख के दिनों में भी,
बस आईने में खुद को देखेंगे—
और उन दिनों की मिठास फिर लौट आएगी।

🙏💖☺

Friday, 21 February 2025

आस्था व आंनद का विराट समागम महाकुम्भ के १४४ साल।

आस्था व आंनद का विराट समागम महाकुम्भ के १४४ साल।  

प्रयागराज में लगे हुए महाकुंभ २०२५  के संबंध में १४४  साल का जुमला बहुत चर्चा में है। सरकार ने इस आयोजन को ऐतिहासिक बताने के लिए कहा कि यह शताब्दियों में एक बार लगने वाला मेला है इसलिए अमृत स्नान किया ही जाना चाहिए। श्रद्धालुओं ने भी तय किया कि चलते हैं....  

महाकुंभ के आरंभ होने के साथ ही श्रद्धालुओं का रेला चल पड़ा। सरकार और सनातन के समर्थक प्रसन्न। हर हर महादेव और हर हर गंगे की गूंज में जय श्री राम भी सम्मिलित हो गया। सब कुछ सही तरीके से चलने लगा। बेहद अनुशासित। लोग आते। डुबकी लगाते। अपने को धन्य समझते। ऐतिहासिक कुंभ है








अमृत स्नान हुए। अखाड़े सजे। शंख ध्वनि हुई। सब अपने और परमार्थ के हित में चले। १४४ साल चल पड़ा। सब ऐतिहासिक था।

ध्यान से देखा जाए तो जीवन का हर क्षण ऐतिहासिक है। जापानी कहावत है कि, "आप एक नदी में दुबारा स्नान नहीं कर सकते। जो क्षण जीवन में आया, वह दुबारा नहीं आएगा।"  हर क्षण ऐतिहासिक है। कोई भी घटना दोहराई नहीं जा सकती।

इस प्रकार कोई भी आवृत्ति असंभव है। फिर भी १४४ साल का जुमला चल गया।

हर महाकुंभ या कुंभ या माघ मेला सहस्त्राब्दियों के बाद लगता है। जो पहली बार लगा था, उसके बाद जितने लगते गए, वह सभी ऐतिहासिक हैं। ग्रह, नक्षत्र, राशि और काल की गणना में भी अनूठे। कुछ भी दोहराया नहीं जा सकता। जो वस्त्र एक बार पहन लिया गया है, वह दुबारा नहीं पहन सकते। जो कौर चबा लिया गया है, उसे पुनः नहीं खा सकते। जिस जल में डुबकी लगा दी, वह जल वही नहीं रह गया। जिसके साथ रह लिया, जिसे भोग लिया, वह दोहराया नहीं जा सकता। जिसने एक शब्द उच्चार दिया, वही पुनः नहीं निकलेगा। हर क्षण परिवर्तन चल रहा है। एक अनवरत प्रक्रिया चल रही है। और इसमें कोई वृत्त भी नहीं है। यदि कोई वृत्त है तो वह हमारे बोध से परे है।

लेकिन यह सब दार्शनिकों की बातें हैं। भारतीय मन इसे मानता है। इसमें गहराई से विश्वास करता है लेकिन इसी के साथ वह इसे गूढ़ विषय मानकर कहता है कि अपना यह ज्ञान, सूक्ष्म अवलोकन अपने पास रखो। भारतीय मानस एक ऐसा आश्रय खोजता है जो उसे उसके मनोनुकूल आदेश देता हो।

स्वाधीनता प्राप्ति के बाद जन्मी पीढ़ी ने पहली बार देखा था कि कोई प्रधानमंत्री निषादों के बीच है। सफाई कर्मियों के पांव धो रहा है। उनका आभार प्रकट कर रहा है। कोई मुख्यमंत्री स्वतः रुचि लेकर आयोजनों को मॉनिटर कर रहा है। समूचे अमले को लगा रखा है कि वह संस्कृति के महत्वपूर्ण विषय को गरिमा और उचित आदर से देखे।
ऐसे में उसकी सुप्त भावना को आश्रय मिलता है। वह उठता है और चल पड़ता है अमृत स्नान की खोज में....





भारतीय मानस धर्म की ध्वजा उठाए चल पड़ा है। मैं इस ऐतिहासिकता और सरकारी विज्ञापन के महत्त्व को नहीं भूल रहा हूं लेकिन जोर देकर कहना चाहता हूं कि यदि भारतीय जनता को १४४ साल की ऐतिहासिकता का अभिज्ञान नहीं भी कराया गया होता तो भी श्रद्धालुओं के आने का सिलसिला वही रहता जैसा कि आज है।

इस महाकुंभ के आयोजन में आग लग गई। मौनीअमावस्या के दिन भगदड़ हो गई। विगत सप्ताह नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर श्रद्धालु दब गए। मीलों तक वाहनों की कतार लगी। लोग भूखे प्यासे रहने के लिए विवश हुए। उन्हें कल्पना से अधिक श्रम करना पड़ा पर उनका धैर्य और उत्साह बना रहा। क्या रेलगाड़ी, क्या बस, क्या हवाई जहाज हर तरफ श्रद्धालु उपस्थित। उससे अधिक दृष्टिगोचर हुए निजी वाहन से पहुंचने के लिए निकले लोग।

दुनिया दांतों तले उंगली दबाए सोच रही है! यह क्या हुआ है। कितना बड़ा मेला है। ब्राजील में कार्निवल लगता है। देश भर में पचास साठ लाख लोग एकत्रित हो जाते हैं। ब्राजील सांबा करने लगता है। यहां एक दिन में साढ़े सात करोड़ श्रद्धालु आते हैं, स्नान करते हैं और अपने गंतव्य पर चल देते हैं। इतने भर से प्रसन्न हैं कि स्वच्छता है। व्यवस्था में लोग लगे हैं। स्रोतस्विनी अविरल है। वह मोक्षदायिनी है।
क्या उन्हें कोई अपेक्षा है? नहीं। वह मुदित हैं। आभारी हैं। अपने को धन्य मान रहे हैं। दूसरे को धन्यवाद कर रहे हैं। महाकुंभ से अमृत रस झर रहा है। शंखनाद जारी है।


यह अमृतकाल है। अयोध्याजी में रामलला के विग्रह की स्थापना। भारत के मंदिरों का पुनरुद्धार चल रहा है। काशी और महाकाल हमारे समक्ष हैं। नए कालचक्र के उद्गम में दुनिया भर से श्रद्धालु आयेंगे। कोई रोक नहीं सकेगा। स्वतः चल पड़ेंगे।

अब यह हम सबका सामूहिक दायित्व है कि हम उनके मार्ग को फूलों से सजा दें। यदि कोई कांटा आए तो उसे उखाड़ फेंके। जो सरकार इसमें सहायक नहीं होगी, वह जनता के चित्त से उतर जाएगी। जो लोग इसमें सहायक होंगे, वही मित्र, सखा, साथी, संघाती कहे जाएंगे।

प्रयागराज का इतना सुंदर वर्णन श्री रामचरितमानस में गोस्वामी जी ने किया है सभी प्रेम से समझें और उसका अर्थ पूरा पढ़ें -

मुद मंगलमय संत समाजू ।
जो जग जंगम तीरथराजू ॥
राम भक्ति जहँ सुरसरि धारा ।
सरसइ ब्रह्म बिचार प्रचारा ॥५ ॥

अर्थात, संत समाज आनंद और मंगलमय होता है। वे संसार में चलते फिरते तीर्थराज होते हैं। वहां राम भक्ति की धारा गंगा के समान प्रवाहित होती है और ब्रह्म विचार का प्रचार होता है।

बिधि निषेधमय कलि मल हरनी ।
करम कथा रबिनंदनि बरनी ॥
हरि हर कथा बिराजति बेनी ।
सुनत सकल मुद मंगल देनी ॥५ ॥

अर्थात, विधि-निषेध रूपी कलियुग की मलिनता को हरने वाली होती है और कर्म कथाएँ सूर्य की पुत्री गंगा के समान होती हैं। हरि और हर की कथाएँ गंगा और यमुना की वेणी के समान सुशोभित होती हैं और उन्हें सुनने से सभी को आनंद और मंगल प्राप्त होता है।

बटु बिस्वास अचल निज धरमा ।
तीरथराज समाज सुकरमा ॥
सबहिं सुलभ सब दिन सब देसा ।
सेवत सादर समन कलेसा ॥६ ॥

अर्थात, संत समाज में रहने वाले लोग अचल विश्वास और धर्म रखते हैं। यह संत समाज तीर्थराज की तरह होता है, जिसमें अच्छे कर्म होते हैं। यह सभी लोगों के लिए, सभी समय और स्थानों में आसानी से उपलब्ध होता है और जो इसे आदरपूर्वक सेवा करते हैं, उनके सभी कष्ट समाप्त हो जाते हैं।

अकथ अलौकिक तीरथराऊ ।
देइ सद्य फल प्रगट प्रभाऊ ॥७ ॥

अर्थात, संत समाज एक ऐसा अद्भुत तीर्थराज है, जिसे शब्दों में पूर्ण रूप से वर्णित नहीं किया जा सकता। इसका प्रभाव तुरंत फल देने वाला और स्पष्ट रूप से देखने योग्य होता है।

॥ दोहा ॥
सुनि समुझहिं जन मुदित मन मज्जहिं अति अनुराग ।
लहहिं चारि फल अछत तनु साधु समाज प्रयाग ॥


अर्थात, जब लोग संत समाज की महिमा को सुनते और समझते हैं, तो वे अत्यंत प्रेमपूर्वक उसमें निमग्न हो जाते हैं और धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - ये चार फल प्राप्त करते हैं। उनके शरीर शुद्ध बने रहते हैं, जैसे प्रयाग में स्नान करने से शारीरिक शुद्धता प्राप्त होती है।

शास्त्र कहते हैं धर्मो रक्षति रक्षितः। सर तत्व यह है कि भले ही धर्म की थोड़ी बहुत समझ हो लेकिन उतना ही व्यवहार में दिखे तो वह बड़े-बड़े धार्मिक चिंतकों के विस्तृत कारनामों से अधिक उत्तम है। क्योंकि जीवन संगम में; 

"यमुना कर्म की प्रतीक हैं और गंगा धर्म की। यमुना कर्मयोगि भगवान श्री कृष्ण के भागीरथी कर्मों की साक्षी बनी, तो गंगा भगीरथ के धर्मपूर्ण प्रयासों से पृथ्वी पर अवतरित हुईं। जब हम कर्म करते हैं तब कुछ ना कुछ कालिमा आ ही जाती है अतः कर्म की प्रकृति श्यामल होती, इसलिए यमुना का रंग श्याम हैं। धर्म धवल होता है, इसलिए गंगा का रंग श्वेत हैं। कर्म और धर्म के परस्पर मिलन से सरस्वती (विद्या) का उद्भव होता है। इन तीनों का संगम हमारे जीवन को सिद्ध तीर्थ बना देता है। तीर्थ उसे कहते हैं जो अपने सम्पर्क में आने वाले प्रत्येक जीव को त्राण (कष्ट) से मुक्त कर तारने की क्षमता रखता हो।"

मेरी प्रार्थना है कि १४४ वर्ष बाद आए महाकुंभ के पुण्य प्रभाव से भारतवर्ष सहित संपूर्ण विश्व में शांति, सौहार्द, कल्याण और उन्नति की अविरल गंगा बहती रहे।

हर हर गंगे ! हर हर महादेव !🙏🌺





Wednesday, 29 May 2024

बचपन के दिन भुला न देना......  

'वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी' जगजीत-चित्रा सिंह द्वारा गाई गई ग़ज़ल की ये पंक्तियाँ सुनते ही हम सब कई बरस पीछे अपने बचपन की यादों में समा जाते हैं। बचपन जहाँ केवल मस्ती ही मस्ती होती है, हम सबका बचपन तितली की तरह उड़ता, चिड़िया की तरह चहकता और गिलहरी की तरह फुदकता हुआ था। सुख और दु:ख की घनी छाँव क्या होती है, इसकी हमें खबर न थी, सावन की पहली फुहार का बेताबी से इंतजार रहता था हम सबको, बूँदें धरती पर गिरी नहीं कि हथेली उसे सहेजने के लिए अपने आप ही आगे बढ़ जाती थी। 

पलकों को छूती हुई वे बूँदें मन को भिगो जाती थी बारिश में भीगने का ऐसा जुनून होता था कि भरी दोपहरी में जब घर के सारे लोग सो रहे हों, तब चुपके से माँ की ओट छोड़ कर दबे पाँव एक कमरे से दूसरा कमरा पार करते हुए, धीरे से किवाड़ खोल कर घर की देहरी (दरवाजा) लांघ जाते थे। देहरी लांघने में खतरा हो, तो दीवार फांदने में देर नहीं करते थे, फिर एक के बाद एक सबको आवाज देते, किसी को खिड़की से पुकारते, तो किसी को पक्षी या जानवर की आवाज के इशारे से पुकारते घर के बाहर ले आते थे, फिर लगता था मस्ती का मेला, खुद की मस्ती, खुद की दुनिया काला घुम्मड़ (घनघोर) आकाश और कौंधती-कड़कड़ाती बिजली के बीच मूसलाधार बारिश में उफन आए पोखरों व नालों में कागज की कश्ती बनाना और उसे दूर तक जाते हुए देखना कितना सुखद अहसास था। 


तब न कपड़े भीगने का डर पास फटकता था, न ही दादाजी की छड़ी और न ही माँ की झिड़की या पिता की पिटाई याद आती थी, उस समय तो मन बस भीगा होता था, मटमैले पानी में डूबती-उतराती कश्तियों में हममें से भला कौन होगा, जिन्हें अपना बचपन बुरा लगता होगा एक वही थाती है, जो जीवन भर हमारे साथ होती है, कभी रात को चुपचाप बिना बताए भी चला आता है, यह शरारती बचपन, हम भले ही यह कहते रहें- भला यह भी कोई उम्र है, जो हम अपने बचपन जैसी हरकत करें? पर वह कहाँ मानता है, थोड़ी-सी चुहल के बाद वह हमसे करा ही लेता है, ऐसी कोई न कोई हरकत, जिसे हम बचपन में बार-बार करते थे। 


एक बार करते समय हम भी थोड़ा सहम गए थे, कहीं किसी ने देख तो नहीं लिया ना, यह होता है बचपन का एक छोटा-सा अहसास, जो मन को भीतर तक गुदगुदा कर रख देता है, हमारे बचपन की तो यह अच्छी तरह याद है, जब हम सब बहते पानी के बीचों-बीच खड़े हो जाते थे, नीचे से रेत खिसकती थी, हमें ऐसी गुदगुदी होती थी, मानों रेत नहीं, रुई के फाहों से कोई हमारे घावों को हल्के से साफ कर रहा हो। 

आज भी जब कभी चोट लगती है, कम्पाउंडर हमारे घाव को रुई से साफ करता है, तो वही अहसास धीरे से हमारे सामने आ खड़ा होता है। हम कनखियों से उसे देख लेते हैं, उसे पास नहीं बुलाते, केवल इसलिए कि कहीं वह हमारे बचपन की शरारतों को गिनना शुरू न कर दे, हममें से शायद ही कोई ऐसा होगा, जिसका बचपन शरारतों के साथ न गुजरा हो। 

शरारत भी ऐसी कि जिसे यदि आज याद किया जाए, तो हमारे यौवन को भी शर्म आने लगे। मेंढक पकड़कर साथी की जेब में डालना, तितलियों और पतंगों को पकड़कर डिब्बे में बंद कर एक साथ छोड़ना, पतंगों के पीछे धागे बाँधना, कीचड़ से सने पैरों समेत बेधड़क घर में घुस जाना, केंचुएँ पर नमक छिड़ककर उसका छटपटाना देखना, पेड़ पर चढ़कर डालियों को तेजी से हिलाकर राहगीर को भिगो देना, बस्ते को जानबूझकर भिगो कर विद्यालय न जाने के बहाने करना, पेन की स्याही को बहते पानी में डालना, पानी भरे जूतों से थपथप करते हुए चलना, पानी भरे गड्ढों से ही गुजरना, ऐसी शरारतों की सूची काफी लंबी हो सकती है, अपने-अपने अनुभवों के आधार पर किंतु यह सारी शरारतें केवल बचपन की ही देन हैं। 

हमारा यौवन इस तरह की शरारतें करने के लिए गवाही नहीं देता। कोमल मन की कोमल भावनाओं से भरा हमारा बचपन आज भी हमारे ही भीतर है, पर हम हैं कि उसे बाहर ही नहीं आने देते,आज जब हम बच्चों को उस तरह की शरारतें करते देखते हैं, तब एक बार तो लगता है कि बच्चे ये क्या कर रहे हैं, पर तभी हमारे भीतर से आवाज आती है, क्या तुमने यह सब नहीं किया? आज हम सोचते हैं कि हमारा बचपन अब चौराहों पर ही सिमट गया है, जहां से एक रास्ता यौवन को गया, एक विवाहित जीवन को गया, एक नौकरी के नाम पर गया और एक यह उम्र, जब बचपन को याद करते हुए आंखें भीग रही हैं। 

पचपन में आंखों का भीगना फिर बचपन में ले जाता है, जब बारिश के पानी को पलकों पर लेते थे। कभी उसका स्वाद अपनी जीभ पर लेते थे। कभी धोखे से पानी यदि खुली आंख पर चला जाता था, तब आंखें काफी पीड़ा देती थी, पर उस समय तो पीड़ा से नाता ही टूटा रहता था हमारा, हम किसी भी पीड़ा को नहीं जानते थे। हमारी पीड़ा वह थी, जब हमारा कोई साथी बुखार से तप रहा होता था, या फिर उसकी झोपड़ी में बारिश का पानी भर जाता था, घर से विद्यालय आते हुए किसी साथी की कापी-किताबें पानी में बह जाती थी और शिक्षक उसे भीगे कपड़ों में ही क्लास के बाहर खड़े कर देते थे, यही थी हमारी पीड़ा। आज हमारा बचपन तो हमारे साथ है, पर हमारे बच्चों का बचपन शायद उनसे दूर जा रहा है। बारिश के बहते पानी में उनकी कागज की कश्ती दूर कहीं चली गई है। उनकी हरकतों में वह अल्हड़ता, वह मस्ती, वह उमंग दिखाई नहीं देती, जिसे हमने विरासत में पाया..

हमारे बचपन में तो चाँद में परियाँ रहती थी, पर हमारे बच्चों के बचपन में परी तो नहीं रहती, बल्कि चाँद में क्या सचमुच जीवन है या नहीं, यह उनके शोध का विषय बना हुआ है. कॉपी-किताबों, टीवी, चैनल, कम्प्यूटर ने उनके बालपन को सीधे यौवन में पहुँचा दिया है। उनका बचपन स्कूल, ट्यूशन और होमवर्क में बंट कर रह गया है। अब नहीं थमती उनकी नन्हीं हथेलियों पर पानी की बूँदें, रिमझिम फुहारें उन्हें भिगो नहीं पाती, पैरों तले फिसलती रेत की गुदगुदी को वे महसूस नहीं कर पाते, उनकी कल्पनाओं में कोई कागज की कश्ती ही नहीं, तितलियों और पतंगों की हल्की-सी छुअन का अहसास भी नहीं जागता उनकी हथेलियों में उनकी नन्हीं आंखों में पल रहे हैं माता-पिता के सपने और पीठ पर है अपेक्षाओं का बोझ, ऐसे में भला कहाँ ठहर पाता है बचपन? 

हमने तो खूब जिया अपने बचपन को, पर हमारी संतान अपने बचपन से काफी दूर हो गई है. यदि हम उनमें अपना ही बचपन देखना चाहते हैं, तो उनके बचपन के साथ अपने बचपन को मिलाकर एक बार, केवल एक बार अपनी छत पर बारिश के पानी में खूब भीगें, खूब बतियाएँ, खूब मस्ती करें और खूब छोड़ें इस बारिश में कागज की कश्तियाँ।


चलते चलते : ये पोस्ट अभी जारी रहेगी बचपन वाली किस्से की तरह कुछ बातें दिमाग में चली हैं वो अगली पोस्ट में ;

Thursday, 16 May 2024


एक स्त्री अपने जीवन में दो पुरूषों को सबसे ज्यादा समझ सकती है...!
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उनसे प्रेम करते हुए एक अपने बेटे को और दूसरा उसे जिससे उसने बिना किसी शर्त बिना किसी चाह के सिर्फ और सिर्फ प्रेम किया हो, ये वो दो पुरूष होते हैं जिसमें एक का जन्म उसकी कोख से होता है और दूसरे का जन्म उसके मन की कोख से होता है।

प्रेमी और पुत्र प्रेम के प्रेम में स्त्री सदा हारकर ही खुद की जीत स्थापित करती है, परन्तु ये दोनों ही पुरूष सबसे ज्यादा इस बात से अनभिज्ञ होते हैं या उनमें इस प्रेम को समझने का बोध नहीं होता।

यह एक रिश्ता ऐसा होता है जिसकी हर बात को हम मन से ही नहीं शरीर से शिराओं से, अपनी त्वचा तक में महसूस कर पाते हैं। इसके लिए स्पर्श ही, भाषा का नहीं भाषा भी स्पर्श का कार्य करती है। मन से मस्तिष्क तक की सभी इन्द्रियां प्रेम की अनुभूतियों में संचित होती है....

जब तक कोई औरत मां नहीं बन जाती वो अपने आपको पूर्ण औरत नही समझती हैं। अतः एक औरत की पूर्णता उसके मां बनने से जुड़ी हुई है।एक औरत के लिए मां बनना एक दैवीय अनुभव होता हैं।जितनी खुशी उसको मां बनने से प्राप्त होती है उससे ज्यादा खुशी उसको किसी अन्य रिश्ते ,नाते, या सम्पूर्ण भौतिक सुविधाओं की प्राप्ति के बाद भी नही होती है।


जहां तक पति और संतान के बीच एक औरत के लिए किसी एक को चुनने के स्थिति आ जाये तो पति पर संतान को ही प्राथमिकता देगी।औरत के लिए संतान उसका अपना सृजन है।और संतान रूप में अपना सृजन उसको इस दुनिया मैं सबसे प्रिय होता हैं।पति उसके लिए गृहस्थ धर्म की जिम्मेदारी है ।सामाजिक संस्कार है।जो उसको निभाना है। पति उसका प्रेम है,प्यार है,सुरक्षा है,उसका सब कुछ है।लेकिन संतान उसके लिए सृजन है।औरत एक नई जिंदगी की वाहक की होती है।असंख्य कष्ट सहन कर संतान को जन्म देती है।इसलिये नैसर्गिक रूप से एक औरत पति के वनिस्पत संतान के ज्यादा निकट होती है।ओर सन्तान ही उसको पति से ज्यादा प्रिय होती है।

प्रेमी और पुत्र मोह के इस प्रेम में

स्त्री सदा हारकर ही
खुद की जीत स्थापित करती है
स्वयं को स्वयं के अनुबंध से मुक्त करती है...!!




  कुछ गीत, कुछ यादें और चंद मिसरों में सिमटा एक अधूरा अफ़साना कभी-कभी लगता है, पूरी ज़िंदगी किसी लंबे उपन्यास की तरह नहीं, बल्कि कुछ गीतों, ...