सुहानी रात ढल चुकी ,न जाने तुम कब आओगे ..... दाशर्निक अर्थ! ============================== ===============




आस्तिकता, नास्तिकता और शांति की खोज
“जहाँ तर्क थक जाता है, वहीं से श्रद्धा की यात्रा शुरू होती है।”
एक समय था जब मैं स्वयं को लगभग नास्तिक मान बैठा था। तर्क, प्रश्न और जीवन की कठिन परिस्थितियाँ—सब कुछ जैसे ईश्वर से दूरी बना रहा था। तब लगता था कि जो दिखाई दे, वही सत्य है; जो सिद्ध न हो, उस पर विश्वास क्यों किया जाए? पर समय के साथ अनुभव ने सिखाया कि जीवन केवल तर्क से नहीं चलता। आज जीवन प्रभु के भरोसे चल रहा है और इस स्वीकार के साथ मन में एक गहरी शांति उतर आई है।
मैं यह बहस छेड़ना नहीं चाहता कि आस्तिक होना सही है या नास्तिक। यह लेख किसी निष्कर्ष को थोपने का प्रयास भी नहीं है। यह केवल एक अनुभव है—कि भक्ति मार्ग अपनाने से मन को एक आधार मिलता है। जीवन के उतार-चढ़ाव में जब सब कुछ डगमगाने लगता है, तब यह भरोसा संबल बन जाता है।
“दुख में ईश्वर को याद करना मजबूरी नहीं, मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है।”
नास्तिक होना वास्तव में आसान नहीं है। जीवन के झंझावात जब आते हैं, तो सबसे दृढ़ तर्क भी कमजोर पड़ने लगते हैं। ज़रा-सी असहायता में ईश्वर का आभास होने लगता है। जिनके पीछे परिवार है, जिम्मेदारियाँ हैं, अपनों की चिंता है—उनके लिए नास्तिकता अक्सर एक विचार भर रह जाती है, जीवन का स्थायी दर्शन नहीं बन पाती।
भक्ति मार्ग मुझे प्रभु के निकट पहुँचने का सबसे सरल और सहज रास्ता लगता है। कर्म, ज्ञान और योग—ये सभी मार्ग महत्त्वपूर्ण हैं, पर भक्ति उन्हें जोड़कर हृदय से जोड़ देती है। भक्ति में न तो अधिक तर्क की आवश्यकता होती है, न ही बौद्धिक प्रदर्शन की। यहाँ केवल समर्पण है।
“अंततः ईश्वर की खोज में निकला मनुष्य, भक्त होकर ही लौटता है।”
धन्य हैं वे लोग, जिन्होंने बिना अधिक भटके भक्ति मार्ग चुन लिया। अन्यथा अधिकांश लोग जीवन भर ईश्वर को खोजते रहते हैं—कभी दर्शन में, कभी शास्त्रों में, कभी प्रश्नों में। और जब अंततः ईश्वर का अनुभव होता है, तो वह अनुभव भक्त बना देता है।
हमारे एक शिक्षक कहा करते थे—नास्तिक व्यक्ति का मन बहुत प्रबल होता है। आस्तिकता जीवन के कई दुखों को सहज बना देती है, पर नास्तिक व्यक्ति अक्सर हर संघर्ष अकेले झेलता है। शायद इसलिए कि वह हर उत्तर स्वयं ढूँढना चाहता है, हर पीड़ा स्वयं सहना चाहता है।
“विज्ञान प्रश्न सिखाता है, अध्यात्म उत्तर की अनुभूति।”
यदि गणित और विज्ञान को गहराई से पढ़ा जाए, तो पूर्ण नास्तिक होना कठिन हो जाता है। कुछ समय के लिए भ्रम हो सकता है, प्रश्न उठ सकते हैं, पर अंततः यह समझ विकसित होती है कि विज्ञान और अध्यात्म विरोधी नहीं हैं। वे एक ही गाड़ी के दो पहिए हैं—एक तर्क का, दूसरा अनुभूति का।
अंत में प्रश्न यह नहीं कि हम आस्तिक हैं या नास्तिक। वास्तविक प्रश्न यह है कि हमें मन की शांति कहाँ मिलती है। यदि भक्ति हमें वह शांति देती है, तो वही हमारा मार्ग है।
ओ३म् शान्तिश् शान्तिश् शान्तिः!🙏🎕😐
दिल ढूंढ़ता है फिर वही…
फ़ुरसत के चार दिन।
पर प्रश्न यही है—वे चार दिन कौन से हैं?
कब मिलते हैं, और कब तक हमारे रहते हैं?
शायद यही वे पल हैं, जिनकी तलाश में मनुष्य पूरी उम्र भटकता रहता है। जब बहादुर शाह ज़फ़र अपने महल को आख़िरी बार निहार रहे थे—तख़्त जा चुका था, साम्राज्य बिखर चुका था—तब उनकी ज़ुबान से निकला यह दर्द आज भी समय की छाती पर दर्ज है—
“उम्र-ए-दराज़ मांग के लाई थी चार दिन,
दो आरज़ू में कट गये, दो इंतज़ार में।”
ज़िंदगी पर बातें होती रही हैं और होती रहेंगी। ज़िंदगी चलती रही है और चलती रहेगी। हम भी शायद यूँ ही ज़िंदगी का साथ निभाते रहेंगे, जब तक ज़िंदगी हमें अपने साथ लेकर चलती है—बिना शर्त, बिना किसी हिसाब-किताब के।
किसी शायर ने कहा था—
“उन्हें नफ़रत हुई सारे जहाँ से,
नई दुनिया कोई लाए कहाँ से।”
और उसी धरातल पर फ़िराक़ गोरखपुरी की पंक्तियाँ उम्मीद जगाती हैं—
“ये माना ज़िंदगी है चार दिन की,
बहुत होते हैं यारों चार दिन भी।”
एक ओर उम्मीद से भरा शायर है, दूसरी ओर इतिहास में विलीन होता एक हारा हुआ बादशाह। ज़िंदगी इन्हीं दो सिरों के बीच झूलती रहती है।
आज मैं अपने पुश्तैनी घर, अपने लोगों से मिलने जा रहा हूँ। बहुत समय बीत गया वहाँ गए हुए। न जाने कैसा होगा अब वह घर, वह मुहल्ला, वह गाँव। मन में अपार ख़ुशी है, तो कहीं भीतर एक हल्का-सा भय भी।
परिवर्तन जीवन का शाश्वत सत्य है—होना भी चाहिए। लेकिन छोटे शहरों का सुकून बड़े शहरों में परछाईं की तरह हमारे साथ चलता है। वह धीरे-धीरे आँखों पर हाथ रखकर झाँकता है कि कहीं उन्नति की चकाचौंध में हमारी दृष्टि कुंद न हो जाए।
घर की याद आते ही मन भर आता है। क्या दिन थे वे! अच्छे थे या बुरे—यह प्रश्न अब अप्रासंगिक है, क्योंकि वे दिन अपने थे। बारिश में भीगते हुए भुट्टे खाना, खेतों में सरसों के पीले फूलों को निहारना, मटर और गन्ने को खेत से तोड़कर खाना—ईश्वर के दिए अन्न का वह स्वाद आज भी स्मृतियों में ताज़ा है।
बारिश के बाद मिट्टी की सोंधी महक, महुआ की ख़ुशबू से गमकती धरती, सड़क पर महुआ बीनते बच्चे—प्रकृति जैसे अपना ख़ज़ाना बिना मूल्य लुटा रही थी। हम सब उस वरदान के साक्षी थे।
विक्रम-बेताल, पंचतंत्र, चाचा चौधरी, नंदन, पराग—इन्हीं कहानियों ने हमारे संस्कार गढ़े। तब पिज़्ज़ा-बर्गर नहीं थे, काला खट्टा और लेमन चूस थे। स्वाद बदले हैं, शायद बेहतर भी हुए हैं, लेकिन दस पैसे में पाँच का जादू आज भी मन में जीवित है।
फिर पढ़ाई आई, किताबें बदलीं, विषय बदले, और बचपन अस्सी के दशक से बाहर निकल आया। गर्मियों में आम-लीची-जामुन और सर्दियों में गोभी, धनिया, गाजर का हलवा—ये स्वाद समय की स्मृति में सुरक्षित हैं।
पीपल और बरगद के झूलों से आसमान छूने का सपना देखते हुए आज हवाई जहाज़ से नीचे झाँकते हैं तो समझ आता है—हम वास्तव में कितने छोटे थे।
समय बदला, समाज आगे बढ़ा। हरियाली सीमेंट में बदलती गई। तरक़्क़ी हुई, पर उसकी कीमत भी चुकानी पड़ी—कटते जंगल, रोते पंछी, दहकती धरती। विज्ञान चाँद से मंगल तक पहुँच गया, लेकिन मानवीय संवेदना सिमटती चली गई।
फिर भी आशा शेष है। चिकित्सा, विज्ञान और वैश्विक सहयोग ने कोरोना जैसी आपदा में वसुधैव कुटुम्बकम् को चरितार्थ किया। भारत सहित विश्व जिस गति से आगे बढ़ रहा है, वह भविष्य के प्रति विश्वास जगाता है।
शाम ढल रही है। शहर के शोर से निकलकर मैं एक पगडंडी पर मुड़ता हूँ। पेड़ों के पीछे सुरमई सूरज गोधूलि में विलीन हो रहा है। गाड़ी में गीत बज रहा है—
“दिल ढूंढ़ता है फिर वही,
फ़ुरसत के रात दिन…”
एक नन्ही-सी तितली गाड़ी के चारों ओर मंडरा रही है।
शायद उसे पता चल गया है—
मैं अपने घर लौट रहा हूँ।🙏💖
मासूमियत से भरी एक स्मृति
छठी कक्षा की बात है—क्लास में वह नई-नई आई थी। लगभग पच्चीस बच्चों में बस छह लड़कियाँ। अस्सी का दशक… सरकारी स्कूल…जहाँ “बेटी पढ़ाओ” का नारा तब तक किसी के कानों तक पहुँचा ही नहीं था। ज़्यादातर माता-पिता की चिंता बस इतनी थी—“लड़की को जल्दी ब्याह देना है।”
लेकिन जैसे ही वह आई, हमारी क्लास का माहौल पल में बदल गया। देहाती सरकारी स्कूल के बच्चे अचानक “जी सर”, “यस मिस” बोलने लगे। काग़ज़ के गोले, चौक के बम—सब गायब।
मानो एक लड़की के आने भर से क्लास टीचर का वर्षों पुराना अनुशासन सपना सच हो गया। उसका नाम था --प्रीति। और सच कहूँ तो उसके प्रीत में पूरा क्लास डूब चुका था। 10–11 साल की वह नाजुक उम्र—
फड़कते बाजू, बढ़ती लंबाई, बदलती आवाज़…हर लड़का खुद को अमिताभ समझने लगा था और उसे—जया या नीतू। दो कसी हुई चोटियाँ, करीने की यूनिफॉर्म, आँखों में हल्का-सा काजल, गालों पर डिंपल और चाल में एक भोली-सी खनक—अगर क़यामत नहीं, तो कम भी नहीं।
लड़कियाँ उससे थोड़ी-सी जलतीं, लड़के उससे पूरी तरह जल उठते—प्यार की आग में! फिलहाल, ‘प्रीति’ का जलवा सिर चढ़कर बोल रहा था…और हम कैसे अछूते रहते?
बस, उसी दिन से डबल आयरन की हुई कमीज़, जमे हुए बाल, समय से पहले स्कूल पहुँचना—सब हमारी दिनचर्या बन गया। पिछली बेंच से धीरे-धीरे पहली बेंच तक की यात्रा शुरू हुई।
तीन दिनों में प्रगति शानदार—दो बार पानी की लाइन में उसने जगह दी, एक बार गिरी हुई कॉपी उठाकर “थैंक्यू” कहा। धड़कनें तेज़, कदम हल्के, सपने बड़े। पहला प्यार… होने नहीं दिया गया—करवा दिया गया!
उस मुस्कान ने मेरे भीतर रंगों की पूरी पिचकारी भर दी।
बस, यह सुनना था कि मेरी हिम्मत में भी एक छोटा-सा फूल खिल उठा। उस दिन मैं कार्यक्रम में भाग लेने तो क्या… चुपचाप पीछे दरवाज़े के पास खड़ा बस प्रीति को गाते सुनने आया था। अचानक मेरे मित्र ने भीड़ में खड़े होकर जोर-जोर से मेरा नाम पुकार दिया—“आमोद कहाँ है? आमोद… आमोद!”
मजबूरी में सामने आना पड़ा। दिल काँप रहा था। और फिर पहली बार गाया—“कोयल बोली, दुनिया डोली… समझो दिल की बोली…” (इससे पहले प्रीति ‘दुनिया में आए हैं तो जीना ही पड़ेगा’ गाकर गई थी।)
उस पल न भीड़ दिखी, न सभागार— बस एक ही सवाल—क्या प्रीति सुन रही होगी?
बस… उसी क्षण लगा पहला प्यार मन ही मन कुलांचे भर रहा था। उसके डिंपल जैसे और गहरे, आवाज़ जैसे और मीठी, और संसार जैसे अचानक बहुत सुंदर हो गया।
पहला प्यार… बस एक मीठी स्मृति बनकर दिल के किसी कोने में हमेशा के लिए थम गया..💖📚🏫
घर की बहू-बेटियां दीया जलाकर अचरा से लक्ष्मी स्वरूपा दीया का माथा टेक कर मुख्य द्वार के चौखट पर रख देती थी। घर के छोटे बच्चे की जिम्मेदारी होती थी कि लालटेन के शीशे को साफ करके चमका कर उसे जला कर बरामदे में टंगी कीली पर टांग दे। अपना चारा खाकर पेट भर चुके पालतू पशु शाम होते ही मालिक का बाट जोहने लगते थे कि मालिक आये और हमें नाद से हटाकर आराम करने वाले खूटे पर बांधे। खड़े होकर चारा खाते-खाते उनके भी पैर दुखने लगते होंगे। पशुओं के देखभाल करने में लगे लोग अपने इधर-उधर के काम निपटा कर पशुओं के पीने के लिए बाल्टी में पानी भरकर रख देते थे।
स्वयं हाथ पैर धोकर बेना (हाथ का पंखा )लेकर सभी बच्चो को बुलाकर चारपाई पर घर की मालकिन (माँ /दादी) बैठ जाती थीं। नन्हें बच्चे दादी के पास चले जाते थे तब सुकून से बहुऍ अपनी ननद के साथ मिलकर रसोई संभाल लेती थी। घर के मुखिया भी, खेत या हाट बाजार का काम निपटा कर हाथ मुँह धोकर एक लोटा पानी पीकर, वहीँ चारपाई पर बैठकर रेडियो में समाचार,गीत सुनते और भोजन बनने की प्रतीक्षा करते और जैसे हिं ठाकुरवाड़ी (गांव के मंदिर) में ठाकुर जी की आरती के बाद भोग लग जाता फिर भोजन करते।
बारिश के मौसम की शाम तो कभी-कभी बेहद चिपचिपी उमस भरी होती थी या फिर ठंडी-ठंडी फुहार पड़ने के बाद आत्मा तक को तृप्त करने वाली ठंडी हवाएं चलती। शाम होते ही मच्छरों का बोलबाला हो जाता। दीया बत्ती करने के बाद भोजन बनाने की बहुत जल्दी रहती थी क्योंकि इस मौसम में अक्सर कीट पतंगे, पाखी उठने का डर रहता है। पशुओं के साथ-साथ अपने नजदीक भी कुछ गीले कुछ सूखे उपले व भूसे का धुआँ किया जाता था ताकि मच्छरो को भगाया जा सके।
शाम को जब सब दुआर (दरवाजे) पर इकट्ठा होकर बैठते थे तब भुजा (मक्का /चावल /चिउड़ा/चना भुना हुआ) खाया जाता था जो हम सबका उस समय का स्नैक्स होता था। किसी दिन बाहर ही उपले जलाकर भुट्टे (मक्की) भूने जाते थे और उनका आनंद लिया जाता था जिस दिन भुट्टे खाये जाते थे उस दिन सबकी भूख कम हो जाती थी तो भोजन में बस खिचड़ी बन जाती थी।
सबसे मस्त सर्दियों की शाम होती थी। धूप ढलते ही बुजुर्गों और बच्चों के स्वेटर निकल आते थे। घर के किशोर बच्चे या मालकिन की ड्यूटी लगती थी कि शाम होने से पहले ही घुरा (अलाव) रख दिया जाय क्योंकि दिन ढलने के बाद बच्चे तुरंत उसे जलाने के लिए मचलने लगता थे। उसी घुरा में आलू, मटर की फली, शकरकंदी डाल दिए जाते थे। बच्चे बैठकर आग सेकते और इन भुनी हुई चीजों का आनंद लेते। रसोई संभालने वाली के मजे रहते थे चूल्हे पर भोजन बनता था और उसकी आग से गर्मी मिलती रहती थी। जब सब भोजन कर लेते तब रसोई संभालने वाली हाथ पैर धोकर अपने हाथ पैर घुरा /बोरसी से सेक कर गर्म करती फिर सोने जाती थी।
संस्मरण_पुण्य_स्मरण🪴
श्रद्धांजलि मेरे जीवन के सबसे बड़े मार्गदर्शक को🙏
कुछ रिश्ते खून के नहीं होते, लेकिन उनका स्थान जीवन में किसी अपने से भी बढ़कर हो जाता है। मेरे फूफा जी (स्वर्गीय श्री जयनारायण सिंह) मेरे लिए वही थे। जब मैं बहुत छोटा था और बाबूजी का साया सिर से उठ गया, तब ज़िंदगी जैसे थम सी गई थी। लेकिन तभी उन्होंने न सिर्फ मुझे सहारा दिया, बल्कि मुझे अपना बेटा मानकर पाला-पोसा। मैंने उनका घर नहीं, अपना घर पाया — और उनके स्नेह, अनुशासन और संरक्षण में पूरे १० -१२ साल बिताए।
वो सख्त ज़रूर थे, लेकिन उनका दिल बेहद कोमल था। उनके हर डांट के पीछे मेरा भविष्य संवारने की चिंता छिपी होती थी। उन्होंने हमेशा मुझे सही राह दिखाने की कोशिश की — चाहे पढ़ाई हो, जीवन के मूल्य हों, या लोगों से व्यवहार। वे खुद बहुत साधारण जीवन जीते थे, लेकिन उनके विचार और संस्कार असाधारण थे। गाँव पंचायत में हर कोई उनका सम्मान करता था, क्योंकि वे सच्चाई, ईमानदारी और न्याय के प्रतीक थे।
वो कहा करते थे — “जीवन में कुछ भी बनो, लेकिन अच्छा इंसान जरूर बनना।” आज जब मैं अपने जीवन में कुछ भी अच्छा करता हूँ, तो उनकी कही ये बात सबसे पहले याद आती है। उनके दिए हुए जीवन मूल्यों और शिक्षा ने मुझे इस लायक बनाया कि मैं अपने पैरों पर खड़ा हो सका। आज जो कुछ भी मैं हूँ, जो भी पहचान बनी है मेरी, उसमें उनका हाथ सबसे बड़ा है। मैं उनका ऋणी हूँ — जन्मों-जन्मों तक।
"मुझे आज भी याद है जब मैंने I.C.W.A.I. (Institute of Cost & Works Accountants of India) का प्रवेश परीक्षा पास किया था, तो वे बहुत खुश हुए थे।' और बहुत हिं जिज्ञासा के साथ पूछे थे-- इसे पढ़कर इंसान क्या बनता है ? उस दिन पहली बार मुझे एहसास हुआ कि मैं अकेला नहीं हूँ — मेरे पास एक छाया है जो हमेशा मेरी रक्षा करेगी।"
"उन्होंने कभी अधिक साधन नहीं जुटाए, लेकिन अपनी ईमानदारी और मेहनत से जो सम्मान कमाया, वह आज भी गांव -पंचायत, सगे -सम्बन्धियों के लिए प्रेरणा है। उन्होंने अपने सिमित संसाधन के साथ तथा छोटे जमीन के टुकड़े को कर्मभूमि बनाकर दिखाया कि लगन और निष्ठा से हर सपना पूरा किया जा सकता है।"
"आज मैं जो कुछ भी सोच पा रहा हूँ या लिख पा रहा हूँ , तो लगता है मानो मैं उन्हीं के शब्द दोहरा रहा हूँ। उन्होंने मेरे ज़ेहन में जो बीज बोए थे, वही अब मेरी सोच और व्यवहार में फल-फूल रहे हैं।"
आज वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी यादें, उनकी सीखें, और उनका आशीर्वाद हमेशा मेरे साथ रहेगा। उनके बिना जीवन अधूरा सा लगता है, लेकिन उनके द्वारा सिखाया हर पाठ मुझे आगे बढ़ने की हिम्मत देता है।
फूफा जी को मेरी ओर से भावभीनी श्रद्धांजलि। आपका स्थान मेरे जीवन में कोई नहीं ले सकता। आप हमेशा मेरी आत्मा में जिंदा रहेंगे।
आज भी जब कभी मैं उच्च या तुच्छ के दंश से पीड़ित होता हूँ तब यह संस्मरण मेरे चित्त को स्वच्छ कर मुझे जीवन के प्रति आदर, आनंद और उत्साह से भर देता है।~ कामोद कुमार सिंह 🙏🥀🎕
वे ऐसी जगह चांदनी बिछा देते, जहाँ लड़कियों के कदम पड़ें तो धरती भी खिल उठे। और जब लड़कियाँ आतीं—सौगात की तरह, जैसे जीवन में अचानक बसंत उतर आया हो, जैसे किसी के देह पर पलाश रंग गया हो। दुपट्टे में चेहरा छुपाए उनकी वह धीमी-सी मुस्कान… और उधर लड़के—पत्तल क्या बिछाते, खुद ही बिछ जाते।
कढ़ाई से निकली सबसे गरम, सुनहरी पूड़ियाँ वे इस अदब से परोसते जैसे दिल परोस रहे हों। आँखें भले न मिलती हों, पर इतनी नज़दीकी… शायद ज़िंदगी में फिर कभी नहीं मिलनी।
कसोरे में जितनी बार "बस कीजिए" कहा जाता, उतनी ही बार दही–बूंदी बढ़ जाती। कुछ लड़कियाँ खास होतीं, और कुछ लड़के भी। इशारों में ही ‘हमारी वाली’ और ‘उसकी वाली’ का बंटवारा हो जाता, और पंगत एक संगीत-सभा जैसी लगती—जिसका अंत न हो।
लड़कियाँ चिड़िया-सी खाते हुए, गिलहरी-सी पूड़ी कुतरती हुई हँसतीं, और लड़के बाल्टियों में खाना लिए बार-बार उनके पास आते।
रामबन वाली भाभी की बहन कल चली जाएगी—यह सोचकर एक लड़का खाली बाल्टी लिए ही उसके पास ठहर जाता। धीरे से कहता—
“सुनो… कल चली जाओगी।”
लड़की लाल पड़ जाती, फिर शरारत से पूछती—
“बाल्टी में तरकारी है क्या? दो न!”
लड़का झेंप जाता—बाल्टी तो खाली है। और लड़की खिलखिलाकर हँस पड़ती।
यह पंगत लड़कों की उम्र बढ़ाने वाली थी।
इशारों में “ऑल द बेस्ट” कहना, ज़रा झुककर घुंघराले बालों में उँगलियाँ फेर देना…
कसोरे में दिल परोसा जा रहा था, पूड़ियों की गर्मी फूँककर दी जा रही थी।
कुछ जूठी पत्तलों पर लड़कियों की नाज़ुक उँगलियों की छुवन रह जाती—और लड़के उन पत्तलों को ऐसे सम्हालकर उठाते जैसे कोई प्रसाद उठा रहे हों। कुछ पूड़ी के छोटे टुकड़े चुपके से खा भी लेते—जैसे उसमें लड़की की मुस्कान बसी हो।
चप्पलों की भीड़ में कुछ लड़के अपनी वाली का चप्पल थामे साइड में खड़े रहते। देह की गंध, पास आती साँसें—इन सबके नशे में डूबे हुए। तभी एक लड़की अपना चेहरा पोंछा रूमाल किसी लड़के की मुट्ठी में ठूँस कर भाग जाती।
पंगत उठ चुकी होती, दीवाने थक चुके होते। घर वाले चाहते कि ये लड़के अब चैन से खा लें—पर ये तो अपनी ही दुनिया में मगन, अनंत आनंद में लिपटे रहते।
वही एक लड़का था—जो भाभी की बहन का जूठा पत्तल मोड़कर छुपा लेता और कहता—
“इसी में खाना खाऊँगा…”
उस जूठे पत्तल में लड़की की झिझकती नज़र थी, उसकी उँगलियों की हल्की छुअन थी।
मन तो करता था उसकी एक उँगली को दाँत से हल्का-सा काट ले—पर इसी सोच से एक उफ़्फ़ जन्म लेती, एक आह-सी बिछड़न फैल जाती।
न तुझे पता, न मुझे पता,
ये निगाहों का ही कसूर था—
न तेरी ख़ता, न मेरी ख़ता।
हम नहीं जानते आने वाले दिन कैसे होंगे—अच्छे या बुरे।
यह भी नहीं पता कि हम जिंदा रहेंगे भी या नहीं।
पर इतना ज़रूर है—कि बीते दिनों का सुख, वे छोटे-छोटे पल…
हमेशा हमारे चेहरों पर चमक बनकर रहेंगे।
दुख के दिनों में भी,
बस आईने में खुद को देखेंगे—
और उन दिनों की मिठास फिर लौट आएगी।
🙏💖☺
कुछ गीत, कुछ यादें और चंद मिसरों में सिमटा एक अधूरा अफ़साना कभी-कभी लगता है, पूरी ज़िंदगी किसी लंबे उपन्यास की तरह नहीं, बल्कि कुछ गीतों, ...