Saturday, 31 January 2026

 

क्यों धुँधला जाती है रिश्तों की यह गर्माहट ?

कृष्ण-दृष्टि से देखें जीवन के रिश्ते




भारतीय जीवन में रिश्तों की गर्माहट बहुत जल्दी जन्म लेती है। अपनापन, उत्साह, सम्मान और आत्मीयता—सब कुछ आरम्भ में जैसे एक साथ खिल उठता है। चाहे वह दाम्पत्य हो, परिवार के नए संबंध हों, मित्रता हो या कार्यस्थल के रिश्ते—शुरुआत अक्सर पूरी ऊर्जा और भावनात्मक उजास से भरी होती है।

पर उतनी ही सहजता से, कभी-कभी यह ऊष्मा धुँधली भी पड़ने लगती है।
जो संबंध कभी उत्सव थे, वे धीरे-धीरे औपचारिकता बन जाते हैं।
कभी-कभी यह ठंडापन खीझ, कटुता और अनकही शिकायतों का रूप ले लेता है।

प्रश्न स्वाभाविक है—
ऐसा क्यों होता है?
क्या रिश्तों का यह क्षरण अनिवार्य है?
और क्या इससे बाहर निकलने का कोई मार्ग है?

यदि हम जीवन के रिश्तों को कृष्ण के जीवन-दर्शन की कसौटी पर परखें, तो यह स्पष्ट होता है कि यह धुँधलापन न किसी एक व्यक्ति की विफलता है, न कोई दुर्भाग्य। यह संबंधों के स्वभाव की एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। इसे समझ लेने पर रिश्तों का बहुत-सा मानसिक बोझ अपने-आप हल्का हो जाता है।


पहला बिन्दु — आरम्भिक सम्मान का “अतिप्रकाश”

हर रिश्ता शुरुआत में एक विशेष चमक के साथ आता है।
नया विवाह, नई मित्रता, नया पद, नया सहयोग—इन सबमें एक तरह का “उत्सव-प्रधान सम्मान” होता है। लोग अधिक ध्यान देते हैं, अधिक शामिल करते हैं, अधिक उत्साह दिखाते हैं।

यह सम्मान नकली नहीं होता, पर टिकाऊ भी नहीं होता।
यह फुलझड़ी की तरह होता है—चमकदार, पर क्षणिक।

समस्या तब पैदा होती है जब यह आरम्भिक ऊँचाई व्यक्ति की स्थायी पहचान बन जाती है।
जब मन मान लेता है—
“यही मेरी वास्तविक कीमत है, यही व्यवहार मुझे हमेशा मिलना चाहिए।”

जैसे ही समय के साथ यह ऊष्मा स्वाभाविक रूप से कम होती है, व्यक्ति उसे अपमान या अवनति समझने लगता है।
यहीं से अहंकार का धुआँ उठता है।

कृष्ण की पहली सीख यही है—
भूमिकाएँ स्थायी नहीं होतीं; वे बदलती हैं। जो इस परिवर्तन को स्वीकार कर लेता है, वह हल्का रहता है।

गोकुल के बाल-कृष्ण और कुरुक्षेत्र के सारथी कृष्ण में आकाश-पाताल का अंतर है, फिर भी वे स्वयं से टकराते नहीं। वे अतीत की भूमिका से चिपके नहीं रहते।

जीवन के हर रिश्ते में यही सत्य लागू होता है।


दूसरा बिन्दु — सम्बन्धों का प्राकृतिक क्षय

मानव-सम्बन्ध स्थिर नहीं होते।
वे समय, परिस्थितियों, प्राथमिकताओं, उम्र, सामर्थ्य और दूरी से प्रभावित होते हैं।

जीवन के शुरुआती चरणों में रिश्तों पर अधिक ऊर्जा लगाई जाती है।
समय के साथ जिम्मेदारियाँ बढ़ती हैं—काम, स्वास्थ्य, परिवार, आर्थिक दबाव। ऐसे में वही भावनात्मक निवेश बनाए रखना सम्भव नहीं रह जाता।

यह किसी की कमी नहीं—यह जीवन का प्रवाह है।

महाभारत में कृष्ण हमें यह दिखाते हैं कि वे किसी भी सम्बन्ध में पूर्ण उपस्थिति की माँग नहीं करते।
वे वही भूमिका निभाते हैं, जिसकी उस समय आवश्यकता होती है—

कभी सखा,
कभी मार्गदर्शक,
कभी श्रोता,
कभी सारथी,
और कभी केवल मौन उपस्थिति।

यदि रिश्तों में भूमिकाएँ न बदलें, तो बंधन भारी हो जाते हैं।


तीसरा बिन्दु — अपेक्षाओं का बोझ

रिश्तों में विषाक्तता का सबसे बड़ा स्रोत है—अपेक्षा।

“वह पहले फ़ोन करे।”
“मेरी अहमियत समझे।”
“मेरे लिए वैसा ही व्यवहार करे जैसा पहले करता था।”

ये अपेक्षाएँ छोटी लगती हैं, पर भीतर से बहुत भारी होती हैं।

कृष्ण अर्जुन से कहते हैं—
“फल की अपेक्षा छोड़ दो; कर्म और सम्बन्ध दोनों हल्के हो जायेंगे।”

जब रिश्तों से अपेक्षाएँ घटती हैं,
तो स्थिरता बढ़ती है।
जहाँ अधिकार का दावा शुरू होता है,
वहीं टकराव जन्म लेता है।


चौथा बिन्दु — हास्य और हल्कापन

कृष्ण का एक अद्भुत गुण था—हर परिस्थिति में स्वयं को हल्का रखना।
मुस्कान, व्यंग्य, खेल—यह सब उन्हें संबंधों में बोझ नहीं बनने देता।

जो व्यक्ति अपने ऊपर हँस सकता है,
वह किसी रिश्ते में तनाव का कारण नहीं बनता।

गंभीरता जब आवश्यकता से अधिक हो जाती है,
तो entitlement जन्म लेता है—
और अधिकार की माँग रिश्तों को कठोर बना देती है।

हल्कापन रिश्तों को तरल बनाए रखता है।


पाँचवाँ बिन्दु — समय पर पीछे हटने की कला

कृष्ण जहाँ आवश्यकता होती है वहाँ उपस्थित रहते हैं,
और जहाँ उनकी उपस्थिति उलझाव बढ़ा सकती है, वहाँ वे पीछे हट जाते हैं।

यह जीवन का एक गहरा सूत्र है—
उपस्थिति भी एक कला है।

हर समय उपलब्ध रहना,
हर विषय पर राय देना,
हर रिश्ते में केंद्र बने रहना—
ये सब रिश्तों को थका देते हैं।

कभी-कभी थोड़ा पीछे हटना
रिश्ते को बचा लेता है।


छठा बिन्दु — रूपान्तरण को स्वीकार करना

कृष्ण का जीवन निरन्तर रूपान्तरण का उदाहरण है—
ग्वाला से राजनीतिज्ञ,
मित्र से मार्गदर्शक,
मानव से दार्शनिक।

वे कभी यह नहीं कहते—
“मैं वही रहूँगा जो पहले था।”

उनकी शक्ति ही उनका परिवर्तन है।

जीवन के हर रिश्ते में यही अपेक्षित है—
रूप बदलना,
स्वर बदलना,
भूमिका बदलना।

जो इसे स्वीकार कर लेता है,
वह रिश्तों को जीवित रखता है।


अंतिम निष्कर्ष

रिश्तों में ऊष्मा कम नहीं होती—
वह केवल अपना रूप बदलती है।

जो व्यक्ति इस बदलाव को अपमान नहीं,
परिपक्वता समझता है,
वह रिश्तों को विषाक्त होने से बचा लेता है।

कृष्ण का जीवन यही सिखाता है—
जो स्वयं को हल्का रखता है,
वह जीवन के भारी से भारी रिश्तों को भी सहज बना लेता है।

और जो स्वयं को केन्द्र मान लेता है,
वह किसी भी रिश्ते में धीरे-धीरे कठोर और धुँधला हो जाता है।

यही सत्य है—
सभी रिश्तों का।    

Friday, 9 January 2026

 सुहानी रात ढल चुकी ,न जाने तुम कब आओगे ..... दाशर्निक अर्थ!          =============================================

संसार बहुत विचित्र है और उतनी ही विचित्र है कवि, रचनाकारों की कल्पना ! विश्व के कण कण में एक संदेश है। सिर्फ उसे खोजने वाली बुद्धि चाहिये!
कोई लेखक, कवि, रचनाकार कुछ भी लिख देता है तो उसका अर्थ पढ़ने सुनने वाले की योग्यता और मानसिक क्षमता पर निर्भर करता है। ऐसा ही एक गीत गीतकार शकील बदायुनी साहब ने लिखा। 

आइये समझते हैं गीत सुहानी रात ढल चुकी का दार्शनिक अर्थ ......

रात्रि में मनुष्य नींद में रहता है, यह गफलत और बेहोशी की स्थिति होती है, उस समय प्राणी वास्तविकता से दूर होकर स्वप्नलोक में विचरण करता है। इसी प्रकार यह जीवन भी मोह निशा में फँसा है। मोह माया के परदे ने सबको अन्धकार में रखा हुआ है इसी अन्धकार से आत्मा प्रकाश में जाना चाहती है - 

"तमसो मा ज्योर्तिगमय, "

यह जीवन (सुखमय) सुहाना प्रतीत होता है और मनुष्य जीवन भर (रात भर) सुखद कल्पनाओं के स्वप्न देखता है और जैसे ही स्वप्न खत्म हुआ ? कहीं कुछ भी नही रहता है। जीवन भर दौड़-धूप आपा-धापी में जीवन बीत जाता है। अन्त में इस नश्वर असार संसार की मोह निशा से त्रस्त पस्त जीव मुक्ति की कामना और छटपटाहट में ईश्वर को पुकारता है, थकित श्रमित आत्मा ,सच्चिदानन्द परमात्मा को पुकारती है, भक्त अपने आराध्य को पुकारता है  -

सुहानी रात ढल चुकी ,न जाने तुम कब आओगे                                 
जहां की रूत बदल चुकी न जाने तुम कब आओगे।



पहले बपचन था, फिर जवानी आई, उसके बाद बुढ़ापा आया। सोच बदली , व्यवहार बदला ,रूचि बदली ,साथी बदले और जीवन के सब खेल बदल गये। यही बात है - 

जहां की रूत बदल चुकी ।                            
नजारे अपनी मस्तियाँ दिखादिखा के खो गए
सितारे अपनी रोशनी  लुटा लुटा के सो गए
हरेक शम्मा जल चुकी न जाने तुम कब आओगे।

जीवन ने बहुत सारे सुख-दुःख के रंग दिखाए, अच्छे बुरे बहुत नजारे दिखाए परन्तु अब वे नजारे खो चुके हैं और संसार की चमक दमक के सितारों की रोशनी लुट गई, खत्म हो चुकी है।  सभी इन्द्रियाँ थक चुकी जीवन के दिये में तेल खत्म होने लगा। सांसों की बाती खत्म होने की अवस्था में आ चुकी , यही तो है

हरेक शम्मा जल चुकी ....
तड़प रहे हैं हम यहाँ तुम्हारे इन्तजार में                                   
खिजां का रंग आ चला है मौसमें बहार में                                      
हवा भी रूख बदल चुकी न जाने तुम कब आओगे .. 

अब तो प्रभु दर्शन की प्यास है। मन तड़पत हरिदर्शन को आज, ईश्वर का ही तो इन्तजार है। जवानी की बहार खत्म हो चली , वृद्धावस्था की खिजां का रंग आ चला ! संसार की हवा भी रूख बदल चुकी ! जो कल तक दीवाने थे वे आज कतराने लगे हैं। जिस काया के बल पर नाज था वह जर्जर होने लगा है, साथी संगी बिछड़ गए, यही बात है -

हवा भी रूख बदल चुकी ...
अतः हे प्रभु  सुहानी रात ढल चुकी ,न जाने तुम कब आओगे ...    

शुभम भवतु! 🙏🧐

Monday, 22 December 2025

 आस्तिकता, नास्तिकता और शांति की खोज

“जहाँ तर्क थक जाता है, वहीं से श्रद्धा की यात्रा शुरू होती है।”

एक समय था जब मैं स्वयं को लगभग नास्तिक मान बैठा था। तर्क, प्रश्न और जीवन की कठिन परिस्थितियाँ—सब कुछ जैसे ईश्वर से दूरी बना रहा था। तब लगता था कि जो दिखाई दे, वही सत्य है; जो सिद्ध न हो, उस पर विश्वास क्यों किया जाए? पर समय के साथ अनुभव ने सिखाया कि जीवन केवल तर्क से नहीं चलता। आज जीवन प्रभु के भरोसे चल रहा है और इस स्वीकार के साथ मन में एक गहरी शांति उतर आई है।

मैं यह बहस छेड़ना नहीं चाहता कि आस्तिक होना सही है या नास्तिक। यह लेख किसी निष्कर्ष को थोपने का प्रयास भी नहीं है। यह केवल एक अनुभव है—कि भक्ति मार्ग अपनाने से मन को एक आधार मिलता है। जीवन के उतार-चढ़ाव में जब सब कुछ डगमगाने लगता है, तब यह भरोसा संबल बन जाता है।

“दुख में ईश्वर को याद करना मजबूरी नहीं, मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है।”

नास्तिक होना वास्तव में आसान नहीं है। जीवन के झंझावात जब आते हैं, तो सबसे दृढ़ तर्क भी कमजोर पड़ने लगते हैं। ज़रा-सी असहायता में ईश्वर का आभास होने लगता है। जिनके पीछे परिवार है, जिम्मेदारियाँ हैं, अपनों की चिंता है—उनके लिए नास्तिकता अक्सर एक विचार भर रह जाती है, जीवन का स्थायी दर्शन नहीं बन पाती।

भक्ति मार्ग मुझे प्रभु के निकट पहुँचने का सबसे सरल और सहज रास्ता लगता है। कर्म, ज्ञान और योग—ये सभी मार्ग महत्त्वपूर्ण हैं, पर भक्ति उन्हें जोड़कर हृदय से जोड़ देती है। भक्ति में न तो अधिक तर्क की आवश्यकता होती है, न ही बौद्धिक प्रदर्शन की। यहाँ केवल समर्पण है।

“अंततः ईश्वर की खोज में निकला मनुष्य, भक्त होकर ही लौटता है।”

धन्य हैं वे लोग, जिन्होंने बिना अधिक भटके भक्ति मार्ग चुन लिया। अन्यथा अधिकांश लोग जीवन भर ईश्वर को खोजते रहते हैं—कभी दर्शन में, कभी शास्त्रों में, कभी प्रश्नों में। और जब अंततः ईश्वर का अनुभव होता है, तो वह अनुभव भक्त बना देता है।

हमारे एक शिक्षक कहा करते थे—नास्तिक व्यक्ति का मन बहुत प्रबल होता है। आस्तिकता जीवन के कई दुखों को सहज बना देती है, पर नास्तिक व्यक्ति अक्सर हर संघर्ष अकेले झेलता है। शायद इसलिए कि वह हर उत्तर स्वयं ढूँढना चाहता है, हर पीड़ा स्वयं सहना चाहता है।

“विज्ञान प्रश्न सिखाता है, अध्यात्म उत्तर की अनुभूति।”

यदि गणित और विज्ञान को गहराई से पढ़ा जाए, तो पूर्ण नास्तिक होना कठिन हो जाता है। कुछ समय के लिए भ्रम हो सकता है, प्रश्न उठ सकते हैं, पर अंततः यह समझ विकसित होती है कि विज्ञान और अध्यात्म विरोधी नहीं हैं। वे एक ही गाड़ी के दो पहिए हैं—एक तर्क का, दूसरा अनुभूति का।



अंत में प्रश्न यह नहीं कि हम आस्तिक हैं या नास्तिक। वास्तविक प्रश्न यह है कि हमें मन की शांति कहाँ मिलती है। यदि भक्ति हमें वह शांति देती है, तो वही हमारा मार्ग है।

ओ३म् शान्तिश् शान्तिश् शान्तिः!🙏🎕😐

 

दिल ढूंढ़ता है फिर वही… फ़ुरसत के कुछ पल

दिल ढूंढ़ता है फिर वही…
फ़ुरसत के चार दिन।

पर प्रश्न यही है—वे चार दिन कौन से हैं?
कब मिलते हैं, और कब तक हमारे रहते हैं?

शायद यही वे पल हैं, जिनकी तलाश में मनुष्य पूरी उम्र भटकता रहता है। जब बहादुर शाह ज़फ़र अपने महल को आख़िरी बार निहार रहे थे—तख़्त जा चुका था, साम्राज्य बिखर चुका था—तब उनकी ज़ुबान से निकला यह दर्द आज भी समय की छाती पर दर्ज है—

“उम्र-ए-दराज़ मांग के लाई थी चार दिन,
दो आरज़ू में कट गये, दो इंतज़ार में।”

ज़िंदगी पर बातें होती रही हैं और होती रहेंगी। ज़िंदगी चलती रही है और चलती रहेगी। हम भी शायद यूँ ही ज़िंदगी का साथ निभाते रहेंगे, जब तक ज़िंदगी हमें अपने साथ लेकर चलती है—बिना शर्त, बिना किसी हिसाब-किताब के।

किसी शायर ने कहा था—
“उन्हें नफ़रत हुई सारे जहाँ से,
नई दुनिया कोई लाए कहाँ से।”

और उसी धरातल पर फ़िराक़ गोरखपुरी की पंक्तियाँ उम्मीद जगाती हैं—
“ये माना ज़िंदगी है चार दिन की,
बहुत होते हैं यारों चार दिन भी।”

एक ओर उम्मीद से भरा शायर है, दूसरी ओर इतिहास में विलीन होता एक हारा हुआ बादशाह। ज़िंदगी इन्हीं दो सिरों के बीच झूलती रहती है।

आज मैं अपने पुश्तैनी घर, अपने लोगों से मिलने जा रहा हूँ। बहुत समय बीत गया वहाँ गए हुए। न जाने कैसा होगा अब वह घर, वह मुहल्ला, वह गाँव। मन में अपार ख़ुशी है, तो कहीं भीतर एक हल्का-सा भय भी।

परिवर्तन जीवन का शाश्वत सत्य है—होना भी चाहिए। लेकिन छोटे शहरों का सुकून बड़े शहरों में परछाईं की तरह हमारे साथ चलता है। वह धीरे-धीरे आँखों पर हाथ रखकर झाँकता है कि कहीं उन्नति की चकाचौंध में हमारी दृष्टि कुंद न हो जाए।

घर की याद आते ही मन भर आता है। क्या दिन थे वे! अच्छे थे या बुरे—यह प्रश्न अब अप्रासंगिक है, क्योंकि वे दिन अपने थे। बारिश में भीगते हुए भुट्टे खाना, खेतों में सरसों के पीले फूलों को निहारना, मटर और गन्ने को खेत से तोड़कर खाना—ईश्वर के दिए अन्न का वह स्वाद आज भी स्मृतियों में ताज़ा है।

बारिश के बाद मिट्टी की सोंधी महक, महुआ की ख़ुशबू से गमकती धरती, सड़क पर महुआ बीनते बच्चे—प्रकृति जैसे अपना ख़ज़ाना बिना मूल्य लुटा रही थी। हम सब उस वरदान के साक्षी थे।

विक्रम-बेताल, पंचतंत्र, चाचा चौधरी, नंदन, पराग—इन्हीं कहानियों ने हमारे संस्कार गढ़े। तब पिज़्ज़ा-बर्गर नहीं थे, काला खट्टा और लेमन चूस थे। स्वाद बदले हैं, शायद बेहतर भी हुए हैं, लेकिन दस पैसे में पाँच का जादू आज भी मन में जीवित है।

फिर पढ़ाई आई, किताबें बदलीं, विषय बदले, और बचपन अस्सी के दशक से बाहर निकल आया। गर्मियों में आम-लीची-जामुन और सर्दियों में गोभी, धनिया, गाजर का हलवा—ये स्वाद समय की स्मृति में सुरक्षित हैं।

पीपल और बरगद के झूलों से आसमान छूने का सपना देखते हुए आज हवाई जहाज़ से नीचे झाँकते हैं तो समझ आता है—हम वास्तव में कितने छोटे थे।

समय बदला, समाज आगे बढ़ा। हरियाली सीमेंट में बदलती गई। तरक़्क़ी हुई, पर उसकी कीमत भी चुकानी पड़ी—कटते जंगल, रोते पंछी, दहकती धरती। विज्ञान चाँद से मंगल तक पहुँच गया, लेकिन मानवीय संवेदना सिमटती चली गई।

फिर भी आशा शेष है। चिकित्सा, विज्ञान और वैश्विक सहयोग ने कोरोना जैसी आपदा में वसुधैव कुटुम्बकम् को चरितार्थ किया। भारत सहित विश्व जिस गति से आगे बढ़ रहा है, वह भविष्य के प्रति विश्वास जगाता है।

शाम ढल रही है। शहर के शोर से निकलकर मैं एक पगडंडी पर मुड़ता हूँ। पेड़ों के पीछे सुरमई सूरज गोधूलि में विलीन हो रहा है। गाड़ी में गीत बज रहा है—
“दिल ढूंढ़ता है फिर वही,
फ़ुरसत के रात दिन…”




एक नन्ही-सी तितली गाड़ी के चारों ओर मंडरा रही है।
शायद उसे पता चल गया है—
मैं अपने घर लौट रहा हूँ।🙏💖

Monday, 8 December 2025

पहला–पहला प्यार… पहली–पहली धड़कनें

मासूमियत से भरी एक स्मृति

छठी कक्षा की बात है—क्लास में वह नई-नई आई थी। लगभग पच्चीस बच्चों में बस छह लड़कियाँ। अस्सी का दशक… सरकारी स्कूल…जहाँ “बेटी पढ़ाओ” का नारा तब तक किसी के कानों तक पहुँचा ही नहीं था। ज़्यादातर माता-पिता की चिंता बस इतनी थी—“लड़की को जल्दी ब्याह देना है।”

लेकिन जैसे ही वह आई, हमारी क्लास का माहौल पल में बदल गया। देहाती सरकारी स्कूल के बच्चे अचानक “जी सर”, “यस मिस” बोलने लगे। काग़ज़ के गोले, चौक के बम—सब गायब।
मानो एक लड़की के आने भर से क्लास टीचर का वर्षों पुराना अनुशासन सपना सच हो गया। उसका नाम था --प्रीति। और सच कहूँ तो उसके प्रीत में पूरा क्लास डूब चुका था। 10–11 साल की वह नाजुक उम्र—

फड़कते बाजू, बढ़ती लंबाई, बदलती आवाज़…हर लड़का खुद को अमिताभ समझने लगा था और उसे—जया या नीतू। दो कसी हुई चोटियाँ, करीने की यूनिफॉर्म, आँखों में हल्का-सा काजल, गालों पर डिंपल और चाल में एक भोली-सी खनक—अगर क़यामत नहीं, तो कम भी नहीं।

लड़कियाँ उससे थोड़ी-सी जलतीं, लड़के उससे पूरी तरह जल उठते—प्यार की आग में! फिलहाल, ‘प्रीति’ का जलवा सिर चढ़कर बोल रहा था…और हम कैसे अछूते रहते?


शाम को खेलते-खेलते मेरे परम मित्र ‘गिरजेश’ (काल्पनिक नाम) ने कहा—“मित्र, कल बढ़िया कपड़ा पहनकर स्कूल आना है।”

बस, उसी दिन से डबल आयरन की हुई कमीज़, जमे हुए बाल, समय से पहले स्कूल पहुँचना—सब हमारी दिनचर्या बन गया। पिछली बेंच से धीरे-धीरे पहली बेंच तक की यात्रा शुरू हुई।

तीन दिनों में प्रगति शानदार—दो बार पानी की लाइन में उसने जगह दी, एक बार गिरी हुई कॉपी उठाकर “थैंक्यू” कहा। धड़कनें तेज़, कदम हल्के, सपने बड़े। पहला प्यार… होने नहीं दिया गया—करवा दिया गया!

होली आने वाली थी। सरकारी स्कूल में पिचकारी कहाँ…सो हम लोग फाउंटेन पेन की स्याही से ही एक-दूसरे को रंग देते। दोस्तों के उकसावे पर मैंने भी हिम्मत करके धीरे से उसके हाथ की पीठ पर नीली स्याही की एक हल्की रेखा खींच दी। वह चौंकी नहीं—बस मुस्कुरा दी। और बोली—“बस इतनी ही होली?”

उस मुस्कान ने मेरे भीतर रंगों की पूरी पिचकारी भर दी।

मैं अंदर से बहुत शर्मीला था। मंच, संगीत, भीड़—सबसे डरता था। पर एक दिन मित्र ने बताया—“प्रीति बहुत अच्छा फिल्मी गीत गाती है!”

बस, यह सुनना था कि मेरी हिम्मत में भी एक छोटा-सा फूल खिल उठा। उस दिन मैं कार्यक्रम में भाग लेने तो क्या… चुपचाप पीछे दरवाज़े के पास खड़ा बस प्रीति को गाते सुनने आया था। अचानक मेरे मित्र ने भीड़ में खड़े होकर जोर-जोर से मेरा नाम पुकार दिया—“आमोद कहाँ है? आमोद… आमोद!”

मजबूरी में सामने आना पड़ा। दिल काँप रहा था। और फिर पहली बार गाया—“कोयल बोली, दुनिया डोली… समझो दिल की बोली…” (इससे पहले प्रीति ‘दुनिया में आए हैं तो जीना ही पड़ेगा’ गाकर गई थी।)

उस पल न भीड़ दिखी, न सभागार— बस एक ही सवाल—क्या प्रीति सुन रही होगी?

कार्यक्रम खत्म हुआ। टीचर ने कहा— “पहले लड़कियाँ बाहर निकलें।” प्रीति धीरे-धीरे चल रही थी। जैसे कुछ कहना चाहती हो। सीढ़ियों से उतरते हुए वह मेरे पास आई और धीमे से बोली— “तुम यह गीत मुझे लिखकर दोगे…?”

बस… उसी क्षण लगा पहला प्यार मन ही मन कुलांचे भर रहा था। उसके डिंपल जैसे और गहरे, आवाज़ जैसे और मीठी, और संसार जैसे अचानक बहुत सुंदर हो गया।

मैंने गीत लिखकर दे दिया। वह उसे छुपा-छुपा कर गुनगुनाती, और क्लास में हमारी नज़रें मिलते ही हल्की-सी मुस्कान बिखेर देती। लेकिन… हमारे मित्र ‘सुरेश’ (काल्पनिक नाम) को भनक लग गई। एक दिन उसने प्रीति के हाथ से वह कागज़ छीन लिया— और अगले दिन पूरे क्लास में फैला दिया। प्रीति रो पड़ी।टीचर आए और मुझे व मेरे एक और मित्र ‘रविंद’ को काफ़ी डाँटा और मारा भी। उसके कुछ ही दिनों बाद प्रीति के पिता का शहर में तबादला हो गया। और वह चली गई—हमारी दुनिया से भी।

हम सब मैट्रिक पास कर शहर में पढ़ने गए। पढ़ाई के साथ-साथ मन में बस एक ही लालसा— कहीं एक बार प्रीति दिख जाए। लेकिन यक़ीन मानिए— उस दिन के बाद प्रीति कभी नहीं मिली।

पहला प्यार… बस एक मीठी स्मृति बनकर दिल के किसी कोने में हमेशा के लिए थम गया..💖📚🏫

Friday, 1 August 2025

कहीं दूर जब दिन ढल जाए साँझ की दुल्हन बदन चुराए चुपके से आए मेरे ख़यालों के आँगन में कोई सपनों के दीप जलाए, दीप जलाए कहीं दूर........


ये पंक्तियाँ सुनने से ही हमारे मन में प्यारी सी शाम की एक आकृति बन जाती है। जिसने जिस-जिस तरीके से इस संध्या बेला को अनुभव किया होता है वो उसी प्रकार से सुहानी शाम को मन में चित्रित करता है। हमारी तो हर मौसम की अलग-अलग तरह की शाम हुआ करती थी। गर्मियों के दिनों में धूप के ओझल होते ही दुआर (घर के बहार का हिस्सा) को बुहार कर साफ करके पानी छिड़क दिया जाता था। चारपाई बाहर निकालकर बिछा दी जाती थी। तपती धरती को जब ठंडा पानी की बुँदे छुती तो ऐसी मन मोहने वाली सुगंध उठती कि उसका मुकाबला महंगे से महंगा इत्र भी न कर सके। 

घर की बहू-बेटियां दीया जलाकर अचरा से लक्ष्मी स्वरूपा दीया का माथा टेक कर मुख्य द्वार के चौखट पर रख देती थी। घर के छोटे बच्चे की जिम्मेदारी होती थी कि लालटेन के शीशे को साफ करके चमका कर उसे जला कर बरामदे में टंगी कीली पर टांग दे। अपना चारा खाकर पेट भर चुके पालतू पशु शाम होते ही मालिक का बाट जोहने लगते थे कि मालिक आये और हमें नाद से हटाकर आराम करने वाले खूटे पर बांधे। खड़े होकर चारा खाते-खाते उनके भी पैर दुखने लगते होंगे। पशुओं के देखभाल करने में लगे लोग अपने इधर-उधर के काम निपटा कर पशुओं के पीने के लिए बाल्टी में पानी भरकर रख देते थे। 

स्वयं हाथ पैर धोकर बेना (हाथ का पंखा )लेकर सभी बच्चो को बुलाकर चारपाई पर घर की मालकिन (माँ /दादी) बैठ जाती थीं। नन्हें बच्चे दादी के पास चले जाते थे तब सुकून से बहुऍ अपनी ननद के साथ मिलकर रसोई संभाल लेती थी। घर के मुखिया भी, खेत या हाट बाजार का काम निपटा कर हाथ मुँह धोकर एक लोटा पानी पीकर, वहीँ चारपाई पर बैठकर रेडियो में समाचार,गीत सुनते और भोजन बनने की प्रतीक्षा करते और जैसे हिं ठाकुरवाड़ी (गांव के मंदिर) में ठाकुर जी की आरती के बाद भोग लग जाता फिर भोजन करते। 





बारिश के मौसम की शाम तो कभी-कभी बेहद चिपचिपी उमस भरी होती थी या फिर ठंडी-ठंडी फुहार पड़ने के बाद आत्मा तक को तृप्त करने वाली ठंडी हवाएं चलती। शाम होते ही मच्छरों का बोलबाला हो जाता। दीया बत्ती करने के बाद भोजन बनाने की बहुत जल्दी रहती थी क्योंकि इस मौसम में अक्सर कीट पतंगे, पाखी उठने का डर रहता है। पशुओं के साथ-साथ अपने नजदीक भी कुछ गीले कुछ सूखे उपले व भूसे का धुआँ किया जाता था ताकि मच्छरो को भगाया जा सके। 

शाम को जब सब दुआर (दरवाजे) पर इकट्ठा होकर बैठते थे तब भुजा (मक्का /चावल /चिउड़ा/चना भुना हुआ) खाया जाता था जो हम सबका उस समय का स्नैक्स होता था। किसी दिन बाहर ही उपले जलाकर भुट्टे (मक्की) भूने जाते थे और उनका आनंद लिया जाता था जिस दिन भुट्टे खाये जाते थे उस दिन सबकी भूख कम हो जाती थी तो भोजन में बस खिचड़ी बन जाती थी। 

सबसे मस्त सर्दियों की शाम होती थी। धूप ढलते ही बुजुर्गों और बच्चों के स्वेटर निकल आते थे। घर के किशोर बच्चे या मालकिन की ड्यूटी लगती थी कि शाम होने से पहले ही घुरा (अलाव) रख दिया जाय क्योंकि दिन ढलने के बाद बच्चे तुरंत उसे जलाने के लिए मचलने लगता थे। उसी घुरा में आलू, मटर की फली, शकरकंदी डाल दिए जाते थे। बच्चे बैठकर आग सेकते और इन भुनी हुई चीजों का आनंद लेते। रसोई संभालने वाली के मजे रहते थे चूल्हे पर भोजन बनता था और उसकी आग से गर्मी मिलती रहती थी। जब सब भोजन कर लेते तब रसोई संभालने वाली हाथ पैर धोकर अपने हाथ पैर घुरा /बोरसी से सेक कर गर्म करती फिर सोने जाती थी। 

हम सबका बचपन तो ऐसे ही बीता है हमारी शाम ऐसे ही हुआ करती थी। अब शहरों में तो कब सुबह हुई कब शाम आयी पता ही नहीं चलता है। सारे मौसम, सुबह शाम, देशी भोजन इन सब का आनंद लेना है तो गांव जाइये वहाँ न सिर्फ ये महसूस कर सकेंगे बल्कि उन्हें जीकर देखेंगे।😊

Wednesday, 16 July 2025

श्रद्धांजलि मेरे जीवन के सबसे बड़े मार्गदर्शक को

 संस्मरण_पुण्य_स्मरण🪴

श्रद्धांजलि मेरे जीवन के सबसे बड़े मार्गदर्शक को🙏

कुछ रिश्ते खून के नहीं होते, लेकिन उनका स्थान जीवन में किसी अपने से भी बढ़कर हो जाता है। मेरे फूफा जी (स्वर्गीय श्री जयनारायण सिंह) मेरे लिए वही थे। जब मैं बहुत छोटा था और बाबूजी का साया सिर से उठ गया, तब ज़िंदगी जैसे थम सी गई थी। लेकिन तभी उन्होंने न सिर्फ मुझे सहारा दिया, बल्कि मुझे अपना बेटा मानकर पाला-पोसा। मैंने उनका घर नहीं, अपना घर पाया — और उनके स्नेह, अनुशासन और संरक्षण में पूरे १० -१२  साल बिताए।

वो सख्त ज़रूर थे, लेकिन उनका दिल बेहद कोमल था। उनके हर डांट के पीछे मेरा भविष्य संवारने की चिंता छिपी होती थी। उन्होंने हमेशा मुझे सही राह दिखाने की कोशिश की — चाहे पढ़ाई हो, जीवन के मूल्य हों, या लोगों से व्यवहार। वे खुद बहुत साधारण जीवन जीते थे, लेकिन उनके विचार और संस्कार असाधारण थे। गाँव पंचायत में हर कोई उनका सम्मान करता था, क्योंकि वे सच्चाई, ईमानदारी और न्याय के प्रतीक थे।

वो कहा करते थे — “जीवन में कुछ भी बनो, लेकिन अच्छा इंसान जरूर बनना।” आज जब मैं अपने जीवन में कुछ भी अच्छा करता हूँ, तो उनकी कही ये बात सबसे पहले याद आती है। उनके दिए हुए जीवन मूल्यों और शिक्षा ने मुझे इस लायक बनाया कि मैं अपने पैरों पर खड़ा हो सका। आज जो कुछ भी मैं हूँ, जो भी पहचान बनी है मेरी, उसमें उनका हाथ सबसे बड़ा है। मैं उनका ऋणी हूँ — जन्मों-जन्मों तक।



"मुझे आज भी याद है जब मैंने I.C.W.A.I. (Institute of Cost & Works Accountants of India) का प्रवेश परीक्षा पास किया था, तो वे बहुत खुश हुए थे।' और बहुत हिं जिज्ञासा के साथ पूछे थे-- इसे पढ़कर इंसान क्या बनता है ? उस दिन पहली बार मुझे एहसास हुआ कि मैं अकेला नहीं हूँ — मेरे पास एक छाया है जो हमेशा मेरी रक्षा करेगी।"

"उन्होंने कभी अधिक साधन नहीं जुटाए, लेकिन अपनी ईमानदारी और मेहनत से जो सम्मान कमाया, वह आज भी गांव -पंचायत, सगे -सम्बन्धियों के लिए प्रेरणा है। उन्होंने अपने सिमित संसाधन के साथ तथा छोटे जमीन के टुकड़े को कर्मभूमि बनाकर दिखाया कि लगन और निष्ठा से हर सपना पूरा किया जा सकता है।"

"आज मैं जो कुछ भी सोच पा रहा हूँ या लिख पा रहा हूँ , तो लगता है मानो मैं उन्हीं के शब्द दोहरा रहा हूँ। उन्होंने मेरे ज़ेहन में जो बीज बोए थे, वही अब मेरी सोच और व्यवहार में फल-फूल रहे हैं।"

आज वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी यादें, उनकी सीखें, और उनका आशीर्वाद हमेशा मेरे साथ रहेगा। उनके बिना जीवन अधूरा सा लगता है, लेकिन उनके द्वारा सिखाया हर पाठ मुझे आगे बढ़ने की हिम्मत देता है।

फूफा जी को मेरी ओर से भावभीनी श्रद्धांजलि। आपका स्थान मेरे जीवन में कोई नहीं ले सकता। आप हमेशा मेरी आत्मा में जिंदा रहेंगे। 

आज भी जब कभी मैं उच्च या तुच्छ के दंश से पीड़ित होता हूँ तब यह संस्मरण मेरे चित्त को स्वच्छ कर मुझे जीवन के प्रति आदर, आनंद और उत्साह से भर देता है।~ कामोद कुमार सिंह 🙏🥀🎕


  कुछ गीत, कुछ यादें और चंद मिसरों में सिमटा एक अधूरा अफ़साना कभी-कभी लगता है, पूरी ज़िंदगी किसी लंबे उपन्यास की तरह नहीं, बल्कि कुछ गीतों, ...